पंचायती राज व्यवस्था
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| अशोक मेहता समिति |
पंचायती राज शब्द का आशय ग्रामीण स्थानीय स्वशासन पद्धति से है । पंचायती राज को भारत के सभी राज्यों में स्थानीय स्तर पर लोकतंत्र के निर्माण हेतु स्थापित किया गया है। उसका कार्य ग्रामीण विकास करना है भारत में स्थानीय स्वशासन का जनक 'लॉर्ड रिपन' को माना जाता है। वर्ष 1882 में लार्ड रिपन ने स्थानीय स्वशासन संबंधी प्रस्ताव पेश किया था जिसे "स्थानीय स्वशासन का मैग्नाकार्टा" कहा जाता है। वर्ष 1919 के भारत शासन अधिनियम के तहत प्रांतों में दोहरा शासन की व्यवस्था की गई तथा स्थानीय स्वशासन को हस्तांतरित विषय के अंतर्गत रखा गया। वर्ष 1935 के भारत शासन अधिनियम के तहत इसे अधिक व्यापक और मजबूत बनाया गया।
पंचायती राज पद्धति का प्रारंभ
पंचायती राज व्यवस्था की स्थापना सर्वप्रथम राजस्थान में हुई थी तत्पश्चात इसे आंध्र प्रदेश ने भी अपनाया था। इस योजना का उद्घाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 2 अक्टूबर 1959 को नागौर(राजस्थान) जिले में किया था। पंचायती राज की स्थापना राजस्थान तथा आंध्र प्रदेश में हो जाने के बाद लगभग सभी राज्यों ने पंचायती राज व्यवस्था लागू की किंतु इनकी संरचना, कार्यकाल, स्तरों की संख्या, कार्य, राजस्व आदि में पर्याप्त अंतर था। मसलन राजस्थान में त्रिस्तरीय पद्धति अपनाई गई जबकि तमिलनाडु ने दो स्तरीय तथा पश्चिम बंगाल ने चार स्तरीय पद्धति अपनाई।
पंचायती राज व्यवस्था का विकास
पंचायती राज व्यवस्था के विकास के लिए निम्न समितियों की स्थापना की गई थी।
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| बलवंत राय मेहता |
1. बलवंत राय मेहता समिति (1957)
2.अशोक मेहता समिति (1977)
3.जीवीके राव समिति (1985)
4.एल. एम. सिंघवी समिति (1986)
5.थुंगन समिति (1988)
6.गाडगिल समिति (1988)
पंचायती राज का संवैधानीकरण
पंचायती राज संस्थाओं का संवैधानीकरण करने का सर्वप्रथम प्रयास राजीव गांधी सरकार ने किया। राजीव गांधी सरकार ने पंचायतीराज संस्था के संवैधानीकरण करने व उन्हें और अधिक शक्तिशाली व व्यापक बनाने के लिए 64 वां संविधान संशोधन विधेयक 1989 में पेश किया। यह विधेयक लोकसभा में तो पास हो गया किंतु राज सभा में पारित न हो सका।
73 वां संविधान संशोधन अधिनियम (1992)
इस अधिनियम को संविधान के भाग 9 तथा अनुच्छेद '243 से लेकर 243 'ओ' के मध्य रखा गया है। इसके लिए संविधान में एक नई अनुसूची (अनुसूची 11) भी जोड़ी गई। इस अधिनियम ने पंचायतीराज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा भी प्रदान किया इस अधिनियम के कारण राज्य सरकारें पंचायती राज पद्धति को अपनाने के लिए बाध्य हो गई। यह संविधान संशोधन तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के कार्यकाल में प्रभावी हुआ।
प्रावधान:
1. एक त्रिस्तरी ढांचे की स्थापना
A.ग्राम पंचायत
B.पंचायत समिति
C. जिला पंचायत
2.ग्राम स्तर पर ग्राम सभा की स्थापना ।
3.हर 5 वर्षों में में पंचायतों के नियमित चुनाव ।
4.अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटों का आरक्षण ।
5.महिलाओं को एक तिहाई सीटों का आरक्षण ।
6.पंचायत की नीतियों में सुधार के लिए उपाय सुझाने हेतु राज्य वित्त आयोग का गठन ।
24 अप्रैल 1993 से यह अधिनियम प्रभावी हुआ था ।
24 अप्रैल को "पंचायती राज दिवस" के रुप में मनाया जाता है।
✍✍ Penned By- Shobhit Awasthi


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