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पंचायती राज व्यवस्था

पंचायती राज व्यवस्था

अशोक मेहता समिति
अशोक मेहता समिति

पंचायती राज शब्द का आशय ग्रामीण स्थानीय स्वशासन पद्धति से है । पंचायती राज को भारत के सभी राज्यों में स्थानीय स्तर पर लोकतंत्र के निर्माण हेतु स्थापित किया गया है। उसका कार्य ग्रामीण विकास करना है भारत में स्थानीय स्वशासन का जनक 'लॉर्ड रिपन' को माना जाता है। वर्ष 1882 में लार्ड रिपन ने स्थानीय स्वशासन संबंधी प्रस्ताव पेश किया था जिसे "स्थानीय स्वशासन का मैग्नाकार्टा" कहा जाता है। वर्ष 1919 के भारत शासन अधिनियम के तहत प्रांतों में दोहरा शासन की व्यवस्था की गई तथा स्थानीय स्वशासन को हस्तांतरित विषय के अंतर्गत रखा गया। वर्ष 1935 के भारत शासन अधिनियम के तहत इसे अधिक व्यापक और मजबूत बनाया गया।


पंचायती राज पद्धति का प्रारंभ


पंचायती राज व्यवस्था की स्थापना सर्वप्रथम राजस्थान में हुई थी तत्पश्चात इसे आंध्र प्रदेश ने भी अपनाया था। इस योजना का उद्घाटन तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 2 अक्टूबर 1959 को नागौर(राजस्थान) जिले में किया था। पंचायती राज की स्थापना राजस्थान तथा आंध्र प्रदेश में हो जाने के बाद लगभग सभी राज्यों ने पंचायती राज व्यवस्था लागू की किंतु इनकी संरचना, कार्यकाल, स्तरों की संख्या, कार्य, राजस्व आदि में पर्याप्त अंतर था। मसलन राजस्थान में त्रिस्तरीय पद्धति अपनाई गई जबकि तमिलनाडु ने दो स्तरीय तथा पश्चिम बंगाल ने चार स्तरीय पद्धति अपनाई।


पंचायती राज व्यवस्था का विकास


पंचायती राज व्यवस्था के विकास के लिए निम्न समितियों की स्थापना की गई थी।


बलवंत राय मेहता समिति
बलवंत राय मेहता

1. बलवंत राय मेहता समिति (1957) 
2.अशोक मेहता समिति (1977) 
3.जीवीके राव समिति (1985) 
4.एल. एम. सिंघवी समिति (1986)
5.थुंगन समिति (1988)
6.गाडगिल समिति (1988)


पंचायती राज का संवैधानीकरण


पंचायती राज संस्थाओं का संवैधानीकरण करने का सर्वप्रथम प्रयास राजीव गांधी सरकार ने किया। राजीव गांधी सरकार ने पंचायतीराज संस्था के संवैधानीकरण करने व उन्हें और अधिक शक्तिशाली व व्यापक बनाने के  लिए 64 वां संविधान संशोधन विधेयक 1989 में पेश किया। यह विधेयक लोकसभा में तो पास हो गया किंतु राज सभा में पारित  न हो सका।


73 वां संविधान संशोधन अधिनियम (1992)


इस अधिनियम को संविधान के भाग 9 तथा अनुच्छेद '243 से लेकर 243 'ओ' के मध्य रखा गया है। इसके लिए संविधान में एक नई अनुसूची (अनुसूची 11) भी जोड़ी गई। इस अधिनियम ने पंचायतीराज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा भी प्रदान किया इस अधिनियम के कारण राज्य सरकारें पंचायती राज पद्धति को अपनाने के लिए बाध्य हो गई। यह संविधान संशोधन तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के कार्यकाल में प्रभावी हुआ।


प्रावधान:


1. एक त्रिस्तरी ढांचे की स्थापना 
          A.ग्राम पंचायत 
          B.पंचायत समिति
          C. जिला पंचायत 

2.ग्राम स्तर पर ग्राम सभा की स्थापना ।

3.हर 5 वर्षों में में पंचायतों के नियमित चुनाव ।

4.अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में सीटों का आरक्षण ।

5.महिलाओं को एक तिहाई सीटों का आरक्षण ।

6.पंचायत की नीतियों में सुधार के लिए उपाय सुझाने हेतु राज्य वित्त आयोग का गठन ।

24 अप्रैल 1993 से यह अधिनियम प्रभावी हुआ था ।
24 अप्रैल को "पंचायती राज दिवस" के रुप में मनाया जाता है।



                         
        ✍✍ Penned By- Shobhit Awasthi

संविधान की प्रस्तावना

संविधान की प्रस्तावना

भारतीय संविधान की प्रस्तावना
Indian Constitution
सर्वप्रथम अमेरिकी संविधान में प्रस्तावना को सम्मिलित किया गया था। धीरे-धीरे इसे अन्य देश   अपनाते गए। भारतीय संविधान के जो मूल आदर्श हैं, उन्हें प्रस्तावना के माध्यम से संविधान में समाहित किया गया। इन आदर्शों को संविधान की प्रस्तावना में वर्णित शब्दों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। प्रस्तावना संविधान के परिचय  या भूमिका को कहते हैं इसमें संविधान का सार होता है।

American constitution
First page of American Constitution

 संविधान सभा में जवाहरलाल नेहरू ने 13 दिसंबर 1946 को एक उद्देश्य प्रस्ताव पेश किया था जिसमें यह बताया गया था कि किस प्रकार का संविधान तैयार किया जाना है। इसी उद्देश्य प्रस्ताव के अंतिम चरण को प्रस्तावना के रूप में संविधान में शामिल किया गया है। इसी कारण इसे उद्देशिका के नाम से भी जानते हैं।

 संविधान की प्रस्तावना


 "हम भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण 'प्रभुत्व संपन्न' 'समाजवादी' 'धर्मनिरपेक्ष' 'लोकतांत्रिक गणराज्य' बनाने के लिए और इसके समस्त नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय विचार अभिव्यक्ति, धर्म, विश्वास, उपासना की 'स्वतंत्रता' प्रतिष्ठा और अवसर की 'समता' प्राप्त कराने के लिए तथा व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता तथा 'अखंडता' सुनिश्चित करने वाला 'बंधुत्व' बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्पित होकर अपनी संविधान सभा में आज दिनांक 26 नवंबर 1949 (मिति मार्गशीर्ष शुक्ल सप्तमी विक्रमी संवत 2006) को एतद द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित, आत्मार्पित करते हैं।"

भारतीय संविधान में प्रस्तावना का विचार अमेरिका के संविधान से लिया गया है, वहीं प्रस्तावना की भाषा को ऑस्ट्रेलिया के संविधान से लिया गया है।

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 प्रस्तावना के मुख्य शब्द :


1. संप्रभुता - भारत अपने आंतरिक व बाह्य निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है।

2. समाजवादी- भारत का हर नागरिक एक समान है। यह लोकतांत्रिक समाजवाद है न कि साम्यवादी समाजवाद । यह गांधीवाद और मार्क्सवाद का मिलाजुला रूप है।

3. पंथनिरपेक्ष- भारत के लिए सभी धर्म समान है तथा वह सभी धर्मों का आदर करता है।

4. लोकतांत्रिक - ऐसी व्यवस्था जो जनता द्वारा जनता के लिए होती है ।

5.गणराज्य -  ऐसी शासन व्यवस्था जिसमे संवैधानिक प्रमुख जनता द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से चुना जाता है अर्थात उसका पद वंशानुगत न हो।

6. न्याय- प्रस्तावना में न्याय तीन रूपों में शामिल है- सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक। न्याय के इन तत्वों को 1917 की रूसी क्रांति से लिया गया है।

7. स्वतंत्रता-  भारत के नागरिकों को खुद का विकास करने की स्वतंत्रता संविधान ने दी हुई है। स्वतंत्रता शब्द को फ्रांस की क्रांति (1789)से लिया गया है

8. समता-  भारतीय संविधान हर नागरिक को स्थिति तथा अवसर की समानता प्रदान करता है। इसमें तीन प्रकार की समता का वर्णन किया गया है- नागरिक, राजनीतिक तथा आर्थिक। समता को भी फ्रांस की क्रांति ( 1789 ) से लिया गया है।

9. अखंडता - भारत एक अखंड राज्य है जिसे सांप्रदायिकता, क्षेत्रवाद ,जातिवाद,भाषावाद, इत्यादि के कारण बांटा नहीं जा सकता।

10 बंधुत्व -इसका अर्थ भाईचारे की भावना से लिया गया है। इसे भी फ्रांस की क्रांति से लिया गया है।

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 प्रस्तावना में संशोधन


बेरुबाड़ी केस(1960) - सुप्रीम कोर्ट ने संविधान की व्याख्या करते हुए कहा कि प्रस्तावना संविधान का भाग नहीं है, इसलिए प्रस्तावना में संशोधन नहीं हो सकता।

 केशवानंद भारती  (1973) केस - सुप्रीम कोर्ट में अपनी पूर्व की व्याख्या को पलटते हुए यह स्वीकार किया कि प्रस्तावना संविधान का भाग है, इसलिए प्रस्तावना में संशोधन हो सकता है।

42 वां संविधान संशोधन (1976)


अब तक प्रस्तावना में मात्र एक बार संशोधन (42वां संविधान संशोधन 1976 )किया गया है इसके जरिए इसमें तीन नए शब्दों को जोड़ा गया है -समाजवादी ,धर्मनिरपेक्षता एवं अखंडता। इस संशोधन को वैध ठहराया गया।


 प्रस्तावना पर विचार


 1.प्रस्तावना संविधान की कुंजी है- जस्टिस हिदायतुल्लाह ।

2. प्रस्तावना संविधान का परिचय पत्र है- N. A. पालकीवाला।

3. संविधान की प्रस्तावना हमारे दीर्घकालिक सपनों का विचार है- अल्लादि कृष्णस्वामी अय्यर।

4. प्रस्तावना हमारी  संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य का भविष्यफल है-  के.एम. मुंशी।

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                                 Penned By -  Shobhit Awasthi

संविधान सभा






संविधान सभा

संविधान सभा के बारे में
संविधान सभा
सर्वप्रथम भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 1935 में भारत के संविधान के निर्माण के लिए आधिकारिक रूप से संविधान सभा के गठन की मांग की हालांकि संविधान सभा के गठन का विचार 1934 में सबसे पहले  एम.एन. राय ने रखा था।
        1935 में कांग्रेस की ओर से पंडित जवाहरलाल नेहरू ने घोषणा की, "स्वतंत्र भारत के संविधान का निर्माण वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनी गई संविधान सभा द्वारा किया जाएगा और इसमें कोई बाहरी हस्तक्षेप नहीं होगा।" नेहरू के इस प्रस्ताव को  सरकार ने अन्ततः स्वीकार कर लिया। इसे अगस्त प्रस्ताव के नाम से भी जाना जाता है।

संविधान सभा का गठन

संविधान सभा का गठन कैबिनेट मिशन योजना द्वारा सुझाए गए प्रस्ताव के तहत 6 दिसंबर 1946 को हुआ जो एक सदनीय थी। संविधान सभा के कुल सदस्य संख्या 389 होनी थी जिसमें 296 ब्रिटिश भारत के लिए आवंटित थी जिनमें 11 गवर्नरो के प्रांत तथा 4  का चुनाव प्रेसिडेंसी से होना था और 93 सीटें रियासतों को आवंटित थी । प्रत्येक सीट 10 लाख की जनसंख्या के आधार पर आवंटित थी।
    संविधान सभा के लिए चुनाव जुलाई-अगस्त 1946 में 296 सीटों पर हुए। इस चुनाव में कांग्रेस को 208, मुस्लिम लीग को 73 तथा स्वतंत्र सदस्यों को 15 सीटें मिली। देशी रियासतो की 93 सीटें नहीं भरी जा सकी क्योंकि रियासतों ने स्वयं  को संविधान सभा से अलग रखने का निर्णय लिया था। संविधान सभा का चुनाव भारत के व्यस्क मताधिकार द्वारा प्रत्यक्ष रूप से नहीं हुआ था फिर भी इसमें प्रत्येक समुदाय मसलन हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति,पारसी के प्रतिनिधियों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिला था तथा संविधान सभा में  महिलाओं को भी शामिल किया गया था। महिलाओं की संख्या 15 थी। महात्मा गांधी को छोड़कर तत्कालीन भारत की सभी बड़ी हस्तियां संविधान सभा में शामिल थी।

        संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को संपन्न हुई। इस बैठक में 211 सदस्यों ने भाग लिया। मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान की मांग का राग अलापते हुए बैठक का बहिष्कार किया। फ्रांस की तर्ज पर सभा के सबसे वरिष्ठ सदस्य डॉ सच्चिदानंद सिन्हा को इस बैठक में अस्थाई अध्यक्ष चुना गया। 11 दिसंबर 1946 को हुई अगली बैठक में डॉ राजेंद्र प्रसाद को सभा का स्थाई अध्यक्ष बनाया गया तथा एच.सी. मुखर्जी तथा वी.टी. कृष्णमाचारी को संविधान सभा का संयुक्त रूप से उपाध्यक्ष चुना गया।
 13 दिसंबर 1946 को जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा में एक ऐतिहासिक उद्देश्य प्रस्ताव पेश किया जिसे 22 जनवरी 1947 को स्वीकार कर लिया गया। इसने संविधान के स्वरूप को काफी हद तक प्रभावित किया। कालांतर में इसका परिवर्तित रूप ही संविधान की प्रस्तावना बना।

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देसी रियासतों के प्रतिनिधि धीरे- धीरे संविधान सभा में शामिल होने लगे । 28 अप्रैल 1947 को 6 राज्यों के प्रतिनिधि सभा  के सदस्य  बन चुके थे 3 जून 1948 को भारत के बटवारे के लिए पेश की गई माउंटबेटन योजना स्वीकार करने के बाद अन्य रियासतो के प्रतिनिधियों ने भी अपनी सीटें ग्रहण कर ली तथा भारतीय क्षेत्र के मुस्लिम लीग के सदस्य भी सभा में शामिल हो गए। देश के विभाजन के हो जाने से संविधान सभा की सदस्य संख्या 299 हो गई जिनमे ब्रिटिश प्रांत की संख्या 229 रियासतों की संख्या 70 थी।

भारतीय संविधान पर जवाहर लाल नेहरू.. हस्ताक्षर करते हुए
जवाहर लाल नेहरू.. हस्ताक्षर करते हुए

संविधान सभा के कार्य 

संविधान सभा के दो मुख्य कार्य थे जिनमें पहला था स्वतंत्र भारत का संविधान बनाना तथा दूसरा देश के कानूनों को लागू करना। जब भी संविधान सभा की बैठक संविधान सभा के रूप में होती थी तो इसकी अध्यक्षता डॉ राजेंद्र प्रसाद करते थे लेकिन जब इसकी बैठक बतौर विधायिका होती थी तो उसकी अध्यक्षता जी.वी. मावलंकर करते थे। संविधान सभा ने 26 नवंबर 1949 तक इन दोनों रूपों में कार्य किया।

अन्य कार्य

1. 22 जुलाई 1947 को राष्ट्रध्वज स्वीकार किया।

2. संविधान सभा ने मई 1949 को राष्ट्रमंडल की सदस्यता स्वीकार की ।

3. 24 जनवरी 1950 को राष्ट्रीय गीत तथा राष्ट्रगान स्वीकार किया।

4. 24 जनवरी 1950 को डॉ राजेंद्र प्रसाद को भारत का पहला राष्ट्रपति चुना गया।

संविधान की अंतिम बैठक 24 जनवरी 1950 को हुई जिसमें संविधान सभा के सदस्यों द्वारा संविधान में हस्ताक्षर किए गए संविधान सभा ने 26 जनवरी 1950 से लेकर 1952 तक अंतरिम संसद का कार्य किया।

महत्वपूर्ण तथ्य:

1.संविधान के बनने में 2 वर्ष 11 माह 18 दिन लगे ।

2. सभा ने लगभग 60 देशों के संविधानो का अवलोकन किया तथा इसके प्रारूप पर 114 दिन तक विचार किया।

3. संविधान निर्माण में कुल 64 लाख का खर्च आया।

 4.संविधान सभा द्वारा हाथी को प्रतीक(मुहर) के रूप में अपनाया गया।

5. सर बी. एन. राव को संविधान सभा के संवैधानिक सलाहकार के रूप में नियुक्त किया गया।

6. एच.वी.आर. आयंगर को संविधान सभा का सचिव नियुक्त किया गया।

7. एल.एन. मुखर्जी को संविधान सभा का मुख्य प्रारूपकार नियुक्त किया गया।

8. प्रेम बिहारी नारायण रायजादा भारतीय संविधान के प्रमुख लेखक थे ।

9.मूल संस्करण का सौंदर्यीकरण तथा सजावट शांति निकेतन के कलाकारों ने किया जिनमें मंदलाल बोस और बिउहर राम मनोहर सिन्हा शामिल थे।

10. मूल प्रस्तावना को प्रेम बिहारी नारायण रायजादा द्वारा हस्तलिखित एवं बिउहर राम मनोहर सिन्हा द्वारा ज्यामितिमय  अलंकृत किया गया था ।

11.मूल संविधान के हिंदी संस्करण का सुलेखन बसंत कृष्ण वैद्य द्वारा किया गया जिसका नंदलाल बोस ने सुंदर ढंग से चित्रांकन किया।

संविधान सभा की प्रमुख समितियां :

1. प्रारूप समिति -ये संविधान सभा की सबसे महत्वपूर्ण समितियों में से एक थी। इसका गठन 29 अगस्त 1947 को हुआ था। इसके अध्यक्ष डॉ बी. आर. अंबेडकर बने तथा अन्य सदस्य N.गोपाल स्वामी आयंगर, अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर,डॉ. के.एम. मुंशी, सैयद मोहम्मद सादुल्ला, N. माधवराव (जो B.L. मित्र की जगह पर आए जिन्होंने स्वास्थ्य कारणों से त्यागपत्र दिया था), टी.टी.कृष्णामाचारी( 1948 में डी.पी. खेतान की मृत्यु हो जाने पर है)

संविधान सभा के सभी सदस्य
Member of constitutional assembly

2.संघ शक्ति समिति- जवाहर लाल नेहरू

3.संघीय संविधान समिति-जवाहर लाल नेहरू

4.प्रांतीय संविधान समिति- सरदार पटेल

5.अल्पसंख्यक समिति- सरदार पटेल

6.प्रक्रिया नियम समिति-डॉ राजेंद्र प्रसाद

7.संचालन समिति-डॉ राजेंद्र प्रसाद

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                        Penned By ✍✍ - Shobhit Awasthi
     

भारत स्वतंत्रता अधिनियम 1947



20 फरवरी 1947 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री क्लीमेंट एटली ने घोषणा की कि 30 जून 1947 को भारत में ब्रिटिश शासन समाप्त हो जाएगा इसके बाद सत्ता उत्तरदायी भारतीय हाथों में सौंप दी जाएगी इस घोषणा पर मुस्लिम लीग ने आंदोलन किया और भारत के विभाजन की बात कही 3 जून 1947 ब्रिटिश सरकार ने स्पष्ट किया कि 1946 में गठित संविधान सभा द्वारा बनाया गया संविधान उन क्षेत्रों में लागू नहीं होगा जो इसे स्वीकार नहीं करेंगे उसी दिन 3 जून 1947 को वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने विभाजन की योजना पेश की जिसे माउंटबेटन योजना कहा गया इस योजना को कांग्रेस और मुस्लिम लीग ने स्वीकार कर लिया। इस प्रकार भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 बना कर उसे लागू कर दिया गया।
    

प्रावधान:
1. इसके तहत भारत में ब्रिटिश राज समाप्त भारत स्वतंत्र संप्रभु राष्ट्र घोषित।

2. दो राष्ट्रों का उदय तथा भारत और पाकिस्तान जिन्हें राष्ट्रमंडल से अलग होने की स्वतंत्रता थी ।

3.वायसराय का पद समाप्त। उसके स्थान पर दोनों डोमिनियन राज्य में गवर्नर जनरल का पद सृजन किया गया जिनकी नियुक्ति ब्रिटिश राज द्वारा संबंधित राष्ट्र की कैबिनेट की सिफारिश पर की जानी थी इन पर ब्रिटेन का कोई नियंत्रण नहीं था।

4. दोनों राज्यों को अपने संविधान बनाने तथा किसी भी देश का संविधान अपनाने की स्वतंत्रता दी गई ।दोनों राज्यों की संविधान सभा को यह भी शक्ति दी गई कि वे किसी भी ब्रिटिश कानून को समाप्त करने के लिए कानून बना सकती थी यहां तक उन्हें स्वतंत्रता अधिनियम को निरस्त करने का अधिकार था ।

5.ब्रिटेन में भारत सचिव का पद समाप्त कर दिया गया भारत सचिव की सभी शक्तियां राष्ट्रमंडल मामलों के राज्य सचिव को स्थानांतरित कर दी गई ।

6.भारतीय रियासतों को यह स्वतंत्रता दी कि वे चाहे तो भारत अथवा पाकिस्तान के साथ मिल सकती हैं या स्वतंत्र सकती हैं।

7.इसमें नया संविधान बनने तक प्रत्येक डोमिनियन में शासन संचालित करने और भारत शासन अधिनियम 1935 के तहत उनकी प्रांतीय सभाओं में सरकार चलाने की व्यवस्था की हालांकि यह एक्ट  दोनों डोमिनियन राज्यों को इस कानून में सुधार करने का अधिकार देता है ।

8.इसमें ब्रिटिश शासक को विधेयकों पर मताधिकार और उन्हें स्वीकृत करने के अधिकार से वंचित कर दिया लेकिन ब्रिटिश शासक के नाम पर गवर्नर जनरल को किसी विधेयक को स्वीकार करने का अधिकार प्राप्त था।

9. भारत के गवर्नर जनरल एवं प्रांतीय गवर्नरो को राज्यो का संवैधानिक प्रमुख नियुक्त किया गया। इन्हें  सभी मामलों पर राज्यों की मंत्रिपरिषद के परामर्श पर कार्य करना होता था।

10. इसने शाही उपाधि से "भारत का सम्राट" शब्द  हटा दिया।

11. इसमें भारत के राज्य सचिव द्वारा सिविल सेवा में नियुक्तियां करने तथा पदों में आरक्षण करने की प्रणाली समाप्त कर दी ।

    14- 15 अगस्त 1947 की मध्य रात्रि को भारत में ब्रिटिश शासन का अंत हो गया और समस्त शक्तियां दो नए राज्य भारत और पाकिस्तान को स्थानांतरित कर दी गई । लॉर्ड माउंटबेटन नये डोमिनियन भारत, के प्रथम गवर्नर जनरल बने। उन्होंने जवाहरलाल नेहरू को भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में शपथ दिलाई। 1946 में बनी संविधान सभा को स्वतंत्र भारत डोमिनियन की संसद के रूप में स्वीकार कर लिया गया।......

                                    ✍✍✍ शोभित अवस्थी

भारत शासन अधिनियम 1935



 यह अधिनियम भारत में पूर्ण उत्तरदाई सरकार के गठन में एक मील का पत्थर साबित हुआ। यह एक लंबा व विस्तृत दस्तावेज था जिसमें 321 धाराएं और 10 अनुसूचियां थी।

 प्रावधान :

 1. इसके द्वारा अखिल भारतीय संघ का प्रावधान किया गया जिसमें ब्रिटिश प्रांतों का शामिल होना अनिवार्य था। किंतु देसी रियासतों का शामिल होना नरेशो की इच्छा पर निर्भर था।

2. संघ व केंद्र के बीच शक्तियों का विभाजन किया गया। विषयों की तीन सूचियां बनाई गई। 1.संघीय सूची 2. प्रांतीय सूची 3. समवर्ती सूची । बची हुई शक्तियां वायसराय को दे दी गई ।

3.प्रांतों में द्वैध शासन की समाप्ति किंतु केंद्र में द्वैध शासन का प्रारंभ किया गया इसमें संघीय विषयों को हस्तांतरित व आरक्षित विषयों में विभक्त करना पड़ा हालांकि अभी लागू न हो सका ।

4. केंद्र में द्विसदनात्मक विधायिका की स्थापना की गई राज्य परिषद (उच्च सदन) तथा केंद्रीय विधानसभा (निम्न सदन)।

5. प्रांतीय विधायिका को प्रांतीय सूची और समवर्ती सूची पर कानून बनाने का अधिकार दिया गया।

6. एक संघीय न्यायालय की स्थापना का प्रावधान किया गया ।संघीय न्यायालय की स्थापना 1937 में की गई ।

7. इसके अंतर्गत वर्मा तथा अदन को भारत से अलग कर दिया गया और उड़ीसा तथा सिंध नाम से  2 नए प्रान्त बनाए गए।

8. प्रांतीय मंत्रिपरिषद को विधानसभा के प्रति जिम्मेदार बना दिया गया और वह एक अविश्वास प्रस्ताव पारित कर उसे पदच्युत कर सकता था विधानमंडल प्रश्नों तथा अन्य पूरक प्रश्नों के माध्यम से प्रशासन पर कुछ नियंत्रण रख सकता था।

9. इस अधिनियम के द्वारा भारत शासन अधिनियम 1858 द्वारा स्थापित भारत परिषद को समाप्त कर दिया गया । इंग्लैंड में भारत सचिव को सलाहकारों की टीम मिल गई।

10. इसके द्वारा मताधिकार का विस्तार किया गया लगभग 10% जनसंख्या को मताधिकार मिल गया।

11. इस अधिनियम के अंतर्गत देश की मुद्रा तथा साख पर नियंत्रण के लिए केंद्रीय बैंक 'भारतीय रिजर्व बैंक' की स्थापना 1 अप्रैल 1935 को की गई जिसके प्रथम गवर्नर "ओसबोर्न स्मिथ" थे।


                                       ✍✍✍ शोभित अवस्थी

साइमन कमीशन


1919 के अधिनियम की धारा 84 के अनुसार 'सर जॉन साइमन' की अध्यक्षता में एक आयोग का गठन नवंबर 1927 को किया गया। इस आयोग का उद्देश्य नये संविधान में भारत की स्थिति का पता लगाना था। इस आयोग में 7 सदस्य थे जो सभी ब्रिटिश थे इसलिए सभी भारतीय दलों ने इसका बहिष्कार किया। 

 सर जान साइमन

आयोग ने रिपोर्ट जून 1930 में पेश की तथा द्वैध शासन प्रणाली, राज्यों में सरकारों का विस्तार, ब्रिटिश भारत के संघ की स्थापना एवं सांप्रदायिक निर्वाचन व्यवस्था को जारी रखने की सिफारिश की। आयोग द्वारा डोमिनियन दर्जे की मांग ठुकरा दिए जाने के बाद कांग्रेस ने 1929 में लाहौर अधिवेशन में पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव पारित किया।

                                       ✍✍✍ शोभित अवस्थी


भारत शासन अधिनियम 1919



 20 अगस्त 1917 को तत्कालीन भारत सचिव मांटेग्यू ने 'हाउस ऑफ कॉमन्स' में एक ऐतिहासिक वक्तव्य दिया जिसमें ब्रिटेन के इरादे का बयान दिया था-

"शासन की सभी शाखाओं में भारतीयों को शामिल करना और स्वायत्तशासी संस्थाओं का क्रमिक विकास जिसमें ब्रिटिश भारत के अभिन्न अंग के रूप में उत्तरदाई सरकार की उत्तरोत्तर उपलब्ध हो सके।"

 इसी घोषणा को कार्यान्वित करने के लिए मोंटफोर्ड रिपोर्ट 1918 प्रकाशित की गई जो 1919 के अधिनियम का आधार बना।

प्रावधान:

1. केंद्रीय एवं प्रांतीय सरकारों के अधिकारों का स्पष्ट विभाजन कर दिया गया ।

2. केंद्रीय व्यवस्थापिका सभा को द्विसदनीय बनाया गया। भारतीय विधानसभा(निम्न सदन) में कुल 144 सदस्य रखे गए जिनमें 103 सदस्य निर्वाचित और शेष 41 सदस्य वायसराय द्वारा मनोनीत होते थे। सदन का कार्यकाल 3 वर्ष का था। भारतीय राज्य परिषद (उच्च सदन) के कुल सदस्यों की संख्या 60 रखी गई जिनमें 33 निर्वाचित व 27 मनोनीत किए जाते थे। इनका कार्यकाल 5 वर्ष का था। दोनों सदन अपना अध्यक्ष चुनते थे।

3. निर्वाचन प्रत्यक्ष निर्वाचन के आधार पर होना प्रारंभ हुआ। 

4. वायसराय विधायिका सभा की राय ठुकरा सकता ठुकरा सकता सकता था।

5. प्रांतों में द्वैध शासन लगा दिया गया । इसमे प्रांतीय विषयों को दो भागों में विभक्त किया गया हस्तांतरित व आरक्षित। हस्तांतरित विषयों पर गवर्नर का शासन होता था और इस कार्य में वह उन मंत्रियों की सहायता लेता था जो विधान परिषद के प्रति उत्तरदायी थे। दूसरी और आरक्षित विषयों पर गवर्नर कार्यपालिका परिषद की सहायता से शासन करता था जो विधान परिषद के प्रति उत्तरदायी नहीं थी। हालांकि यह व्यवस्था काफी हद तक असफल रही ।

6. केंद्रीय कार्यकारिणी किसी भी प्रकार व्यवस्थापिका के प्रति उत्तरदाई न थी। 

7.वायसराय की कार्यकारिणी परिषद के 6 सदस्यों में से (commander-in-chief को छोड़कर) तीन सदस्यों का भारतीय होना आवश्यक था।

8. सांप्रदायिक आधार पर सिखों, भारतीय ईसाइयों, आंग्ल भारतीय और यूरोपीय के लिए भी पृथक निर्वाचन के सिद्धांत को विस्तारित किया गया।

9.इस कानून ने संपत्ति, कर या शिक्षा के आधार पर सीमित संख्या में लोगों को मताधिकार प्रदान किया।

10. भारत संबंधित कार्यों के लिए एक नवीन अधिकारी 'भारतीय हाई कमिश्नर' की नियुक्त की गई।

11. भारत सचिव का वेतन ब्रिटिश राज कोष से दिया जाने लगा।

12. इस अधिनियम के अंतर्गत एक लोक सेवा आयोग का गठन किया गया। अतः 1926 में सिविल सेवकों की भर्ती के लिए केंद्रीय लोक सेवा आयोग की स्थापना हुई।

13. इसमें पहली बार केंद्रीय बजट राज्यों के बजट से अलग कर दिया और राज्य विधानसभाओं को अपना बजट स्वयं बनाने के लिए अधिकृत कर दिया।

 1919 के अधिनियम में अनेक खामियां थी। इसने जिम्मेदार सरकार की मांग को पूरा नहीं किया। केंद्र तथा राज्यों के बीच शक्तियों के बंटवारे के बावजूद ब्रिटिश भारत का संविधान एकात्मक राज्य का संविधान ही रहा। द्वैध शासन पूरी तरह विफल रहा। गवर्नर जनरल का वर्चस्व कायम रहा। वित्तीय शक्ति के अभाव में मंत्री अपनी नीतियों को प्रभावी रूप से कार्यान्वित नहीं कर सकते थे। इसके अलावा मंत्री विधानमंडल के प्रति सामूहिक रूप से जिम्मेदार नहीं थे। मंत्रियों को दो मालिकों को खुश करना पड़ा था एक तो विधान परिषद और दूसरा गवर्नर जनरल।

                                      ✍✍✍ शोभित अवस्थी

भारतीय परिषद अधिनियम 1909

भारत परिषद अधिनियम 1909

1892 का अधिनियम राष्ट्रवादियों को संतुष्ट न कर सका था। साथ ही राष्ट्रीय आंदोलन पर उग्रवादी नेताओं का प्रभाव बढ़ता जा रहा था। भारत सचिव "लार्ड मार्ले" तथा वायसराय "लार्ड मिंटो" दोनों सहमत थे कि कुछ सुधारों की आवश्यकता है। "सर अरुंडेल कमेटी" की रिपोर्ट के आधार पर फरवरी 1909 में नया अधिनियम पारित किया गया जिसे "भारतीय परिषद अधिनियम1909" कहा गया। यह अधिनियम मार्ले मिंटो सुधार के नाम से विख्यात है।

प्रावधान:

1. केंद्रीय व प्रांतीय विधान परिषदों के आकार में काफी वृद्धि की गई। केंद्रीय परिषद में सदस्य संख्या 16 से बढ़कर 60 हो गई जिसमें 27 सदस्य निर्वाचित होते थे। प्रांतीय व्यवस्थापिका के सदस्यों की संख्या में भी वृद्धि की गई जैसे  मुंबई, कोलकाता, मद्रास में 50 व अन्य प्रांतों में संख्या 30 की गई।

2. केंद्रीय परिषद में सरकारी बहुमत को बनाए रखा लेकिन प्रांतीय परिषदों में गैर सरकारी  सदस्यों के बहुमत की अनुमति थी।

3. भारतीयों को प्रशासन तथा विधि निर्माण के कार्यों में प्रतिनिधित्व दिया गया।

4. पृथक निर्वाचन के आधार पर मुस्लिमों के लिए सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व का प्रावधान किया। इसके अंतर्गत मुस्लिम सदस्यों का चुनाव मुस्लिम मतदाता ही कर सकते थे। लॉर्ड मिंटो को 'सांप्रदायिक निर्वाचन के जनक' के रूप में जाना जाता है।

 5. पहली बार किसी भारतीय को वायसराय और गवर्नर की कार्यपरिषद के साथ एसोसिएशन बनाने का प्रावधान किया गया। "सत्येंद्र नाथ सिन्हा" वायसराय की कार्यपरिषद के प्रथम भारतीय सदस्य बने। उन्हें  विधि सदस्य बनाया गया।

6. इसके अंतर्गत दोनों स्तरों (केंद्रीय व प्रांतीय) पर परिषदों के चर्चा कार्यों का दायरा बढ़ाया गया मसलन अनुपूरक प्रश्न पूछना, बजट पर संकल्प रखना आदि किंतु सशस्त्र सेना, विदेश संबंध और देशी रियासतों को विधायिका के क्षेत्र से बाहर रखा था। यद्यपि प्रत्येक स्थिति में वायसराय को उनकी सलाह ठुकराने का अधिकार था।

7. स्त्रियों को मताधिकार नहीं दिया गया ।

8. भारत सचिव को मद्रास और बंबई में कार्यकारिणी के सदस्यों की संख्या 2 से 4 कर देने का अधिकार दिया गया। वायसराय भारत सचिव से अनुमति लेकर यही व्यवस्था बंगाल व अन्य प्रांतों में भी कर सकते थे।

         इस अधिनियम की सबसे बड़ी त्रुटि यह थी कि पृथक (सांप्रदायिक) आधार पर निर्वाचन की पद्धति लागू की गई। यह पद्धति बहुत ही अस्पष्ट थी। संसदीय प्रणाली को दे दी गई परंतु उत्तरदायित्व नहीं दिया गया।



                                                       ✍✍✍शोभित अवस्थी

भारतीय परिषद अधिनियम 1892

भारत परिषद अधिनियम 1892

1861 एक्ट के अंतर्गत परिषद् में गैर सरकारी सदस्य या तो बड़े जमीदार होते थे या अवकाश प्राप्त अधिकारी या भारत के राजपरिवार के सदस्य। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा अधिक प्रतिनिधित्व की मांग की जाती रही। यूरोपीय व्यापारियों की ओर से भी भारत सरकार को इंग्लैंड में स्थित इंडिया ऑफिस से अधिक स्वतंत्रता की मांग की जाती रही। 'सर जान चिजनी' की अध्यक्षता में एक कमेटी बनी जिसके सुझावो का समावेश 1892 के अधिनियम में किया गया।

प्रावधान:

1. प्रांतों में व्यवस्थापिका सभा के गैर सरकारी तथा कुल सदस्यों की संख्या में वृद्धि कर दी गई। संयुक्त प्रांत में यह संख्या 15 तथा मुंबई व मद्रास में यह संख्या 20 निश्चित की गई ।

2. केंद्रीय व्यवस्थापिका सभा के गैर सरकारी तथा कुल सदस्यों की संख्या कम से कम 10 और अधिक से अधिक 16 निश्चित की गई की गई जिसमें 10 सदस्यों का गैर सरकारी  होना आवश्यक था।

3. वायसराय को सदस्यों को नियमित करने और नियम बनाने का अधिकार मिला।

4. केंद्रीय और प्रांतीय परिषद के भारतीय सदस्यों को वार्षिक बजट पर बहस करने का अधिकार और सरकार से प्रश्न पूछने का अधिकार दिया गया। प्रश्न पूछने से 6 दिन पूर्व सूचना देनी पड़ती थी किंतु अनुपूरक प्रश्न नहीं पूछे जा सकते थे। किसी प्रश्न का उत्तर देने से भी इनकार किया जा सकता था।

5. विधान परिषद के अतिरिक्त सदस्य स्थानीय संस्थाओं जैसे नगरपालिका समितियों, व्यापार संघ, जिला बोर्ड तथा विश्वविद्यालय के द्वारा चुने जाने की व्यवस्था की गई परंतु निर्वाचन पद्धति अप्रत्यक्ष थी तथा इन निर्वाचित सदस्यों को मनोनीत  की संज्ञा दी जाती थी।



                                                      ✍✍✍शोभित अवस्थी

भारत शासन अधिनियम 1861

भारत शासन अधिनियम 1861

   1861 का भारतीय परिषद अधिनियम भारत के संवैधानिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण और युगांतकारी घटना है। यह 2 मुख्य कारणों से महत्वपूर्ण है। एक इसने गवर्नर जनरल को अपनी विस्तारित परिषद में भारतीय जनता के प्रतिनिधियों को नामजद कर के उन्हें विधायी कार्यों से सम्बद्ध करने का अधिकार देना। दूसरा मुंबई व मद्रास की सरकार को भी विधायी शक्तियां देना।

प्रावधान:

1.वायसराय को अपनी परिषद में 6 से 12 सदस्यों की वृद्धि करने का अधिकार दिया गया जो कानून निर्माण उनकी सहायता करते थे इनमें से आधे सदस्यों का गैर सरकारी होना आवश्यक था। इनका कार्यकाल 2 वर्ष का था तथा वायसराय इनकी राय को ठुकरा सकता था।

2. वायसराय की कार्यकारिणी में पांचवें सदस्य के रूप में "अर्थमंत्री" की नियुक्ति की  गई जो गैर सरकारी सदस्य था।

3. वायसराय को अध्यादेश जारी करने का अधिकार दिया गया जो छह माह तक वैद्य रहता था।

 4.प्रान्तों को विधि निर्माण करने का अधिकार दिया गया।

5. वायसराय को परिषद में कार्य संचालन के लिए अधिक नियम वह आदेश बनाने की शक्तियां प्रदान की गई। इसने लॉर्ड कैनिंग द्वारा 1859 में प्रारंभ की गई पोर्टफोलियो प्रणाली को भी मान्यता दी गई जिसके तहत प्रत्येक सदस्य को एक से अधिक सदस्यों को कार्यभार ग्रहण करना होता था।

6. बंगाल (1862), उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत(1866)तथा पंजाब (1897) में विधान परिषद का गठन हुआ।

7. 1862 में लॉर्ड कैनिंग ने तीन भारतीयों बनारस के राजा, पटियाला के महाराजा तथा सर दिनकर राव को विधान परिषद में मनोनीत किया।



                                     ✍✍✍ शोभित अवस्थी

भारत शासन अधिनियम 1858

ताज का शासन

     "भारत शासन अधिनियम 1858"

  इस कानून का निर्माण 1857 के विद्रोह के बाद किया गया जिसे भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम या सिपाही विद्रोह भी कहा जाता है। 1 नवंबर 1858 को लॉर्ड कैनिंग ने इलाहाबाद में साम्राज्ञी द्वारा भारत सरकार के उत्तरदायित्व की घोषणा करने के लिए एक दरबार का आयोजन किया जिसमें उन्होंने भारत के लोगों तथा राजाओं के नाम महारानी का घोषणा पत्र पढ़ा। यह अधिनियम "भारत के शासन को अच्छा बनाने वाला अधिनियम" के नाम से प्रसिद्ध है।

प्रावधान:

1. भारत का शासन सीधे महारानी (विक्टोरिया) के अधीन चला गया।

2. गवर्नर जनरल अब वायसराय कहलायेगा जो ब्रिटिश ताज का प्रत्यक्ष प्रतिनिधि बन गया । लॉर्ड कैनिंग भारत के प्रथम वायसराय बने।

 3.भारत में शासन की द्वैध प्रणाली समाप्त कर दी गई जो पिट्स इंडिया एक्ट के द्वारा प्रारंभ की गई थी ।

4.एक नए पद "भारत सचिव" का सृजन किया गया जिसमें भारतीय प्रशासन पर संपूर्ण नियंत्रण की शक्ति निहित थी। यह सचिव ब्रिटिश कैबिनेट का सदस्य था।

5. भारत सचिव की सहायता के लिए 15 सदस्यीय परिषद "भारत परिषद" का गठन किया गया जिसका अध्यक्ष भारत सचिव होता था और प्रकृति से यह सलाहकारी थी।

6. भारत परिषद के 15 सदस्यों में से 7 की नियुक्ति का अधिकार सम्राट तथा शेष सदस्यों के चयन का अधिकार कंपनी के डायरेक्टर को दिया गया। इसके लिए यह भी आवश्यक था कि वो(जिन्हें चुना जाना था) भारत में कम से कम 10 वर्षों तक सेवा कर चुके हो।

7.अखिल भारतीय सेवाओं व अर्थव्यवस्था से संबंधित मसलों पर भारत सचिव भारत परिषद की राय मानने को बाध्य था।

8.भारत के गवर्नर जनरल को भारत सचिव की आज्ञा के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य कर दिया गया। उसे इसकी वार्षिक रिपोर्ट ब्रिटिश संसद के सम्मुख रखनी पड़ती थी।

9.भारत के शासन संबंधित सभी कानूनों एवं कार्यो के लिए भारत सचिव की स्वीकृति अनिवार्य थी।

10.कोर्ट ऑफ़ डायरेक्टर्स  और बोर्ड ऑफ कंट्रोल समाप्त कर दिए गए और उनके समस्त अधिकार भारत सचिव को सौंप दिए गए ।

11. भारत सचिव व भारत परिषद को मिलाकर गृह सरकार का निर्माण किया गया ।

12. भारत मंत्री को वायसराय से गुप्त व्यवहार तथा ब्रिटिश संसद में प्रतिवर्ष भारतीय बजट पेश करने का अधिकार दिया गया ।

13. अनुबंध सिविल सेवा में नियुक्तियां खुली प्रतियोगिता द्वारा की जाने लगी।



                                    ✍✍✍✍ शोभित अवस्थी

चार्टर एक्ट 1813

चार्टर एक्ट 1813

   
 चार्टर एक्ट 1793 के द्वारा कंपनी के अधिकारों को अगले 20 वर्षों के लिए बढ़ा दिया गया था। अब 1813 में कंपनी के चार्टर की अवधि समाप्त होने की थी तो इंग्लैंड में कंपनी के व्यापारी एकाधिकार को समाप्त करने की मांग की जाने लगी। कंपनी के भारतीय साम्राज्य में अत्यधिक वृद्धि हो जाने से भी उसके व्यापारी तथा राजनीतिक दोनों मोर्चों को संभालना मुश्किल हो गया था। साथ ही नेपोलियन द्वारा लागू की गई "महाद्वीपीय व्यवस्था" से अंग्रेजों के लिए यूरोपीय व्यापार के मार्ग बंद हो गए थे इसलिए सभी चाहते थे कि कंपनी का एकाधिकार समाप्त हो। यह राजपत्र लॉर्ड हेस्टिंग्स के कार्यकाल के दौरान आया था।

प्रावधान:


1. कंपनी के व्यापार का एकाधिकार समाप्त कर दिया गया हालांकि चाय  व अफीम का व्यापार तथा चीन के साथ व्यापार पर एकाधिकार बना रहा।

2. कंपनी को और अगले 20 वर्षों के लिए भारतीय प्रदेशों और राजस्व पर नियंत्रण का अधिकार दे दिया गया किंतु स्पष्ट कर दिया गया इससे इन प्रदेशों का क्राउन के प्रभुत्व पर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

3. भारतीयों की शिक्षा के लिए कंपनी को प्रतिवर्ष ₹100000 खर्च करने का निर्देश दिया गया।

4. सभी अंग्रेज व्यापारियों को भारत से व्यापार करने की छूट दे दी गई।

5. ईसाई धर्म प्रचारको को धर्म प्रचार करने हेतु भारत आने की सुविधा प्रदान की गई।

6. ब्रिटिश व्यापारियों और इंजीनियरों को भारत आने और यहां बसने की अनुमति दी गई लेकिन इसके लिए उन्हें संचालक मंडल या नियंत्रण  बोर्ड से लाइसेंस लेना आवश्यक था।

7.कंपनी को फौजी कानून बनाने का अधिकार, फौजी अदालतें  गठित करने का अधिकार तथा फौजी प्रशिक्षण हेतु विद्यालय को चलाने का भी अधिकार दिया गया।

8.न्याय व्यवस्था का विशेष प्रबंध किया गया।

9.यूरोपीय हितो के लिए एक विशप तथा तीन पादरी भारत में नियुक्त किये गए।

                                      ✍✍✍✍ शोभित अवस्थी

चार्टर एक्ट 1833

 चार्टर अधिनियम 1833

1813 के अधिनियम के बाद भारत में कंपनी के साम्राज्य में काफी वृद्धि हुई तथा महाराष्ट्र, मध्य भारत, पंजाब, सिंध, ग्वालियर, इंदौर आदि पर पर अंग्रेजों का प्रभुत्व स्थापित हो गया। इसी प्रभुत्व को स्थायित्व प्रदान करने के लिए 1833 का चार्टर अधिनियम पारित किया गया।

प्रावधान:

1. भारतीय प्रदेशों तथा राजस्व पर कंपनी के अधिकार को 20 वर्षों के लिए बढ़ा दिया गया किन्तु निश्चित कर दिया गया कि भारतीय प्रदेशों का प्रशासन अब ब्रिटिश सम्राट के नाम से किया जाएगा।

2. बंगाल के गवर्नर जनरल को "भारत का गवर्नर जनरल" बना दिया गया जिसमें सभी नागरिक व सैन्य शक्तियां निहित थी संपूर्ण भारत का प्रथम गवर्नर जनरल "लॉर्ड विलियम बैंटिक" बना।

3. सभी कर गवर्नर जनरल की आज्ञा से ही लगाए जाने थे और उसे ही इसके व्यय का अधिकार दिया गया।

4. कंपनी के चाय तथा चीन के साथ व्यापार के एकाधिकार को समाप्त कर उसे पूर्णतया प्रशासनिक और राजनीतिक संस्था बना दिया गया।

5. अंग्रेजों को बिना अनुमति भारत में आने तथा रहने की आज्ञा दी गई । वे भारत में भूमि भी खरीद कर सकते थे।
6. सपरिषद गवर्नर जनरल को ही भारत के लिए कानून बनाने का अधिकार दिया गया तथा मद्रास और बंबई की कानून बनाने की शक्ति समाप्त कर दी गई।

7. गवर्नर जनरल की परिषद में एक चौथा सदस्य "विधि विशेषज्ञ" के रूप में बढ़ा दिया गया।

8. भारतीय कानूनों को संचालित संहिताबद्ध तथा सुधारने की भावना से एक विधि आयोग की नियुक्ति की गई। इस आयोग का प्रथम अध्यक्ष "लार्ड मैकाले" था जो कि गवर्नर जनरल के परिषद में विधि विशेषज्ञ की हैसियत से भी था।

9. कंपनी के प्रदेशों में रहने वाले किसी भारतीय को केवल धर्म,वंश, जाति, रंग या जन्म स्थान इत्यादि के आधार पर कंपनी के किसी पद से जिसके वह योग्य हो वंचित नहीं किया जाएगा। हालांकि "कोर्ट आफ डायरेक्टर्स" के विरोध के कारण इस प्रावधान को समाप्त कर दिया गया।

10. मुंबई तथा मद्रास के गवर्नरो की परिषद के सदस्यों की संख्या घटा कर 2 कर दी गई।

11. मुंबई तथा मद्रास को मुख्य सेनापति के धीन अपनी अलग -अलग सेनाएँ रखनी थी किंतु उनका नियंत्रण केंद्र सरकार के अधीन ही रखा गया।

12. आगरा तथा पश्चिमी अवध को सम्मिलित करके एक नवीन प्रांत "उत्तर पश्चिम प्रांत" का गठन किया गया।

13. भारत में दास प्रथा को गैरकानूनी घोषित किया गया तथा गवर्नर जनरल को निर्देश दिया गया कि भारत से दास प्रथा को समाप्त करने के लिए आवश्यक कदम उठाए ।भारत में दास प्रथा का उन्मूलन 1843 में लार्ड एलेनबरो द्वारा किया गया।

14. बोर्ड ऑफ कंट्रोल का प्रधान भारतीय मामलों का मंत्री बना दिया गया।

                                            ✍✍✍ शोभित अवस्थी

चार्टर एक्ट 1853

चार्टर अधिनियम 1853

1853 का राजपत्र भारतीय शासन (ब्रिटिश कालीन) के इतिहास में अंतिम चार्टर एक्ट था। यह अधिनियम मुख्यतः भारतीयों की ओर से कंपनी के शासन की समाप्ति मांग तथा तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड डलहौजी की रिपोर्ट पर आधारित था । संवैधानिक विकास की दृष्टि से यह अधिनियम एक महत्वपूर्ण अधिनियम था।


प्रावधान:

1. ब्रिटिश संसद को किसी भी समय कंपनी के भारतीय शासन को समाप्त करने का अधिकार प्रदान किया गया।

2. विधि सदस्य को गवर्नर जनरल की परिषद का पूर्ण सदस्य बना दिया गया।

3. बंगाल के लिए पृथक लेफ्टिनेंट गवर्नर की नियुक्ति की गई।

4. गवर्नर जनरल को अपने परिषद के उपाध्यक्ष की नियुक्ति का अधिकार दिया गया।

5. विधाई कार्यों को प्रशासनिक कार्यों से पृथक करने की व्यवस्था की गई।

6. निदेशक मंडल में सदस्यों की संख्या 24 से घटाकर 18 कर दी गयी जिनमें 6 की नियुक्ति ब्रिटेन के सम्राट द्वारा की जानी थी।

7.  गवर्नर जनरल व गवर्नरो की परिषद के सदस्यों की नियुक्ति सम्राट की अनुमति के बिना नहीं की जा सकती थी।

8. गवर्नर जनरल की परिषद में कानून निर्माण की सहायता के लिए 6 नवीन सदस्यों की नियुक्ति की गई किंतु गवर्नर जनरल उन सभी की राय को ठुकराने का अधिकार रखता था।

9. भारतीय केंद्रीय विधान परिषद में स्थानीय प्रतिनिधित्व प्रारंभ किया गया। गवर्नर जनरल की परिषद में 6 नए सदस्यों में से 4 का चुनाव बंगाल, मद्रास, मुंबई और आगरा के स्थानीय प्रांतीय सरकारों द्वारा किया जाना था।

10. कंपनी के कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए प्रतियोगी परीक्षा की व्यवस्था की गई। इस प्रकार विशिष्ट सिविल सेवा भारतीयों के लिए भी खोल दी गई। इसके लिए 1854 में "लार्ड मैकाले" की अध्यक्षता में समिति का गठन किया गया।

11. भारतीय विधि आयोग की रिपोर्ट पर विचार करने के लिए इंग्लैंड में वित्त आयोग का गठन किया गया।

                                             ✍✍✍शोभित अवस्थी

पिट्स इण्डिया एक्ट

रेगुलेटिंग एक्ट के दोषों को दूर करने के लिए इस अधिनियम को पारित किया गया था। इस अधिनियम से संबंधित विधेयक ब्रिटेन के तत्कालीन प्रधानमंत्री "पिट द यंगर" ने संसद में  प्रस्तुत किया। 1784 में ब्रिटिश संसद द्वारा इसे पारित कर दिया गया।


उपबंध:

1. एक नियंत्रण बोर्ड की स्थापना की गई जिसे भारत में अंग्रेजी अधिकृत क्षेत्र पर पूरा अधिकार दिया गया इसे "बोर्ड ऑफ कंट्रोल" के नाम से जाना जाता था। इसके सदस्यों की नियुक्ति ब्रिटेन के सम्राट द्वारा की जाती थी। इसके 6 सदस्यों में से एक ब्रिटेन के अर्थमंत्री, दूसरे विदेश सचिव तथा चार 4 प्रिवी काउंसिल के सदस्यों में से सम्राट द्वारा चुने जाते थे।

2. गवर्नर जनरल की कार्यकारी परिषद की सदस्य संख्या 4 से घटाकर 3 कर दी गई। इनमें से एक स्थान मुख्य सेनापति को दे दिया गया।

3. कंपनी के भारतीय अधिकृत प्रदेश को पहली बार "ब्रिटिश अधिकृत भारतीय प्रदेश" कहा गया।

4. गवर्नर जनरल को देशी राजाओं से युद्ध तथा संधि से पूर्व कंपनी के संचालकों से स्वीकृत लेना आवश्यक कर दिया गया।

5. मद्रास तथा मुंबई में गवर्नर की सहायता के लिए  तीन सदस्यीय  परिषद का गठन किया गया।

6. मुंबई तथा मद्रास पूरी तरह से गवर्नर जनरल के अधीन कर दिया गया।

7. बोर्ड ऑफ कंट्रोल को कंपनी के नाम आदेशों व निर्देशों  को स्वीकृत या अस्वीकृत करने का अधिकार मिल गया।
8. अंग्रेज अधिकारियों के मामले में सुनवाई के लिए इंग्लैंड में एक कोर्ट की स्थापना की गई।

               इसके साथ ही 1786 में भी एक अधिनियम पारित किया गया इसके  प्रावधान निम्न है:

1. गवर्नर जनरल को विशेष परिस्थितियों में अपनी परिषद के निर्णय को रद्द करने तथा अपने निर्णय को लागू करने का अधिकार दे दिया गया।

2. गवर्नर जनरल को सेनापति की शक्तियां भी दे दी गई।



                                               ✍✍✍✍शोभित अवस्थी

रेग्यूलेटिंग एक्ट


1764 बक्सर युद्ध के पश्चात क्लाइव ने बंगाल, बिहार, उड़ीसा पर दोहरे शासन प्रबंध के अंतर्गत शासन करना आरंभ किया। यह व्यवस्था 7 वर्षों तक जारी रही। इस समय कर्मचारियों के मध्य भ्रष्टाचार अपने उच्च स्तर पर था। निजी व्यापार रिश्वत आदि से कर्मचारी मालामाल हो रहे थे जबकि कंपनी मुनाफा नहीं कमा पा रही थी । इसी बीच ब्रिटिश सरकार ने कंपनी के मामले में कुछ कानून बनाने का निश्चय किया जिसमें रेगुलेटिंग एक्ट 1773 प्रथम था।


अधिनियम के प्रावधान कुछ इस प्रकार थे :

1. बंगाल के गवर्नर को बंगाल का गवर्नर जनरल बना दिया गया जिसके अधीन मद्रास तथा मुंबई के गवर्नर कर दिए गए।

2. प्रथम गवर्नर जनरल वारेन हेस्टिंग्स को बनाया गया।

3. गवर्नर जनरल की सहायता के लिए चार सदस्यीय कार्यकारी परिषद का गठन किया गया जिसका कार्यकाल 5 वर्ष का था। यह सदस्य क्लेवरिंग, मानसल, बरवैल तथा फिलिप फ्रांसिस थे तथा कोर्ट ऑफ़ डायरेक्टर की सिफारिश पर सम्राट द्वारा इन्हें हटाया जा सकता था।

4. निर्णय बहुमत के आधार पर होता था निर्णायक मत का अधिकार गवर्नर जनरल के पास था।

5. कोर्ट ऑफ डायरेक्टर 4 वर्ष के लिए चुने जाने लगे प्रतिवर्ष एक- चौथाई सदस्य को अवकाश लेना पड़ता था तथा उनके स्थान पर नए सदस्य निर्वाचित होते थे।

6. इस एक्ट के तहत 1774 में सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना की गई जिसमें एक मुख्य न्यायाधीश तथा अन्य तीन सहायक न्यायाधीश थे। प्रथम मुख्य न्यायाधीश सर एलिजा  एम्पे थे।

7. 500 पाउंड के स्थान पर 1000 पाउंड के शेयरधारकों को कोर्ट आफ डायरेक्टर्स चुनने का अधिकार दिया गया।

8. कानून बनाना गवर्नर जनरल तथा कार्यकारी परिषद का कार्य था किंतु उसे लागू करने से पूर्व भारत सचिव की अनुमति आवश्यक थी।

रेगुलेटिंग एक्ट को संशोधित करते हुए 1781 में संशोधन अधिनियम पारित किया गया जिसे एक्ट ऑफ़ सेटलमेंट  कहते हैं इसके प्रावधान निम्न थे :

1. इसमें सर्वोच्च न्यायालय के न्यायक्षेत्रो को स्पष्ट किया गया जिसमें सर्वोच्च न्यायालय पर यह रोक लगा दी गई कि वह कंपनी के कर्मचारियों के उन कार्यो के विरुद्ध कार्यवाही नहीं कर सकता जो उन्होंने सरकारी अधिकारी की हैसियत से किया हो।

2. कानून बनाने व लागू करते समय भारतीयों के सामाजिक तथा धार्मिक रीति-रिवाजों का सम्मान करने का निर्देश दिया गया।

3. कोलकाता की सरकार को बंगाल, बिहार,उड़ीसा के लिए भी विधि बनाने का अधिकार दिया गया।

                                                    ✍✍✍ शोभित अवस्थी

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