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मौर्य कालीन प्रशासन


मौर्य प्रशासन


मौर्य राजवंश (322 - 185 ईसा पूर्व) प्राचीन भारत का अत्यधिक शक्तिशाली राजवंश था । मौर्यों द्वारा 137 वर्षों तक भारत पर  शासन किया गया । भारत में पहली बार राजनीतिक एकता मौर्यों के समय में ही देखी गई । मौर्य शासन काल में सत्ता का केंद्रीकरण किया गया। राजा को एक अति महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था किंतु राजा निरंकुश नहीं था। कौटिल्य ने अपनी पुस्तक अर्थशास्त्र में राज्य के सप्तांग सिद्धांत दिए थे जिनके द्वारा मौर्य शासन चलता था। सप्तांग में  राजा , आमात्य,  जनपद, दुर्ग, कोष, सेना, मित्र शामिल थे।

केंद्रीय प्रशासन

अर्थशास्त्र से हमें यह पता चलता है कि मौर्य काल में केंद्रीय प्रशासन में नियुक्त शीर्ष अधिकारियों को तीर्थ कहा जाता था। इनकी संख्या 18 थी। इन्हें महामात्य भी कहा जाता था। अधिकतर अधिकारियों को नकद वेतन दिया जाता था जिनमें मंत्री, सेनापति, पुरोहित, युवराज आदि अधिकारी शामिल थे। इन्हें 48 हजार पण की राशि मिलती थी । एक पण में तीन चौथाई तोले के बराबर चांदी का सिक्का होता था। इन अधिकारियों के नीचे द्वितीय श्रेणी के पदाधिकारी आते थे जिन्हें अध्यक्ष कहा जाता था इनकी संख्या 26 बताई जाती है । यूनानी लेखकों ने इन्हें मजिस्ट्रेट कहा है।
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प्रांतीय प्रशासन

चंद्रगुप्त मौर्य ने शासन को बेहतर ढंग से चलाने के लिए अपने विस्तृत साम्राज्य को चार भागों में विभाजित किया था। इन प्रांतों को चक्र कहते थे। इन प्रांतों का शासन सम्राट के प्रतिनिधि देखते थे जिनमें मुख्यतः राजकुमार होते थे । प्रांतों पर शासन करने वाले राजकुमार को कुमार या आर्यपुत्र कहते थे तथा इनकी सहायता के लिए प्रत्येक प्रांत में महामात्र नामक अधिकारी होते थे। प्रशासन की शीर्ष  इकाई केंद्र होता था। अशोक ने इन प्रांतों में कलिंग को शामिल कर दिया था। अब इनकी संख्या पांच हो गई थी।

प्रान्त                        राजधानी

1.प्राची                     पाटलिपुत्र
2.उत्तरापथ               तक्षशिला
3.दक्षिणापथ             सुवर्णगिरी
4.अवंतिराष्ट्र              उज्जयिनी
5.कलिंग                   तोसली

मेगस्थनीज़ की पुस्तक इंडिका से हमें ज्ञात होता है कि नगर का एक प्रशासक मंडल होता था जिसमें 30 सदस्य होते थे तथा यह मंडल 6 समितियों में विभक्त था। नगर को अपराध मुक्त रखने के लिए पुलिस व्यवस्था का प्रावधान था जिसे रक्षिण कहा जाता था। नगर का प्रमुख नागरक कहलाता था ।
नगर प्रशासन में तीन प्रकार के अधिकारी होते थे-
1.एग्रोनोमोई ( जिलाधिकारी )
2.अंटोनोमोई (नगर आयुक्त)
3.सैन्य अधिकारी

मौर्य प्रशासन की सबसे निम्न इकाई ग्राम थी। ग्राम के प्रधान को ग्रामिक कहते थे जो वर्तमान व्यवस्था के अनुसार चुना जाता था अर्थात ग्रामिक राजकीय अधिकारी नहीं होता था। वह ग्राम की जनता द्वारा चयनित होता था। ग्रामीण जनपदों  की देखभाल के लिए राजुक नियुक्त किए जाते थे जिनके पास कर संग्रहण तथा न्यायिक शक्तियां होती थी । राजुक राजकीय कर्मचारी होते थे। ग्रामिक के ऊपर गोप होता था जो 10 ग्रामों का प्रमुख होता था। 100 ग्रामों का समूह संग्रहण कहलाता था जिसका प्रमुख स्थानिक होता था।

आर्थिक नियंत्रण

भारत की राजस्व प्रणाली की रूपरेखा तैयार करने का श्रेय मौर्यों को जाता है। राज्य की अर्थव्यवस्था कृषि, पशुपालन तथा वाणिज्य पर आधारित थी। इन्हें सम्मिलित रूप से वार्ता कहा जाता था। कौटिल्य के अनुसार राज्य में 27 अध्यक्ष नियुक्त थे जो आर्थिक गतिविधियों का नियमन करने का कार्य करते थे। सिंचाई तथा जल के बंटवारे की व्यवस्था राज्य द्वारा की जाती थी ।   मेगस्थनीज के अनुसार मौर्य राज में अधिकारी द्वारा जमीन का मापन तथा नहरों का निरीक्षण किया जाता था। राजकीय भूमि का प्रमुख अधिकारी सीताध्यक्ष कहा जाता था। राजकीय भूमि पर कृषि का कार्य  दास, बंदी तथा कर्मचारी आदि कार्य करते थे । राज्य की आय का मुख्य स्रोत भूमि कर था जो उपज का छठवां भाग  होता था। कर निर्धारण का सर्वोच्च  अधिकारी समाहर्ता होता था तथा सन्निधाता राजकीय कोषागार और भंडागार का संरक्षक होता था।

 प्रमुख कर

 1.सीता- राजकीय भूमि से होने वाली आय
 2.भाग-कृषकों द्वारा उत्पादित सामग्री का छठवां भाग
 3.प्रदेश्य -आयात कर
 4.निष्क्राम्य -निर्यात कर
 5.विष्टि -बेगार (निशुल्क श्रम)
 6.सेतुबंध- सिंचाई कर
 7.हिरण्य- पशु कर
 8.बलि- कृषको  से ली गई भेट
 9.प्रणय- आपातकालीन कर

मौर्य काल में व्यापार जल व थल दोनों मार्गों से होता था। घरेलू तथा बाहरी व्यापार विकसित थे। भारत का बाहरी व्यापार रोम, सीरिया फारस, मिस्र तथा अन्य पश्चिमी देशों के साथ होता था। काशी, उज्जयिनी, तक्षशिला, कौशाम्बी, पाटलिपुत्र, तोसली आदि आंतरिक व्यापार के प्रमुख केंद्र थे।

सामाजिक जीवन

मेगस्थनीज ने भारतीय समाज को 7 जातियों में विभक्त किया है- दार्शनिक, कृषक, पशुपालक, कारीगर (शिल्पी), सैनिक, निरीक्षक तथा सभासद। कौटिल्य द्वारा सभी वर्ण के लोगों के सेना में होने का विवरण दिया गया है। कौटिल्य ने शूद्रों को आर्य कहा है। संतान की उत्पत्ति ही विवाह का मूल उद्देश्य था । स्त्रियों को तलाक प्राप्त करने तथा पुनर्विवाह की अनुमति थी। वेश्यावृत्ति का प्रचलन भी मौर्य काल में था तथा इसे राजकीय संरक्षण प्राप्त था। स्वतंत्र रूप से वेश्यावृत्ति करने वाली स्त्रियाँ रूपजीवा कही जाती थी। गणिकाओं (वेश्याओं) की गतिविधि पर ध्यान रखने वाले अधिकारी को गणिकाअध्यक्ष कहा जाता था। अच्छे घर की महिलाएं घर से नहीं निकलती थी इन्हें अर्थशास्त्र में अनिष्काशिनी कहा गया है।

धार्मिक जीवन

मौर्य काल में वैदिक धर्म प्रचलन में था जो कुलीन वर्ग तक ही सीमित था। पतंजलि के अनुसार इस काल में मूर्तियों को बेचा जाता था। मूर्तिकार को देवताकारू कहा जाता था। ब्राह्मणों द्वारा कर्मकांड व अनुष्ठान कराए जाते थे तथा उन्हें राज्य द्वारा करमुक्त भूमि प्राप्त थी। कौटिल्य ने ऐसी भूमि को ब्रह्मदेय कहा है। पाली ग्रंथों में ब्राह्मणों को निस्साल कहकर वर्णित किया गया है।

न्याय

मौर्य काल में सम्राट सर्वोच्च न्यायाधीश होता था। जबकि ग्रामसभा सबसे छोटा न्यायालय होता था। ग्राम सभा में ग्रामणी (ग्रामिक) तथा ग्राम वृद्ध अपना निर्णय देते थे। इसके ऊपर संग्रहण, द्रोणमुख, स्थानीय एवं जनपद के न्यायालय होते थे। मौर्य न्याय व्यवस्था कठोर तथा न्याय की प्रकृति आदर्शवादी थी।

कला


वास्तुकला  में मौर्यों ने अतुलनीय योगदान दिया है। मौर्य काल में ही पत्थर की इमारत बनाने का कार्य भारी पैमाने पर प्रारंभ हुआ। मेगस्थनीज के अनुसार पाटलिपुत्र स्थित राजप्रासाद उतना ही भव्य था जितना ईरान की राजधानी में बना राजप्रासाद। मौर्य काल की सर्वोत्तम कृतियां एक ही प्रस्तर खंड से निर्मित स्तंभ हैं जिनके शीर्ष पर भव्य मूर्तियां स्थापित हैं। चाहे हम बात  मथुरा की करें या चुनार से प्राप्त मूर्तियों की, सभी एक ही पत्थर से निर्मित है। सर्वाधिक प्रसिद्ध सारनाथ स्तंभ है। इसके शीर्ष पर चार सिंह स्थापित है तथा बीच में एक चक्र बना हुआ है जो धर्म चक्र का प्रतीक है।
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सैन्य तथा गुप्तचर व्यवस्था

मौर्य काल में सैन्य व्यवस्था छः समितियों में विभक्त थी। प्रत्येक समिति में पाँच सैन्य विशेषज्ञ रहते थे। पैदल सेना, गज सेना, रथसेना अश्वसेना और नौसेना के प्रबंधन की जिम्मेदारी इन समितियों पर थी। सैन्य प्रबंधन के सर्वोच्च अधिकारी को अंतपाल कहते थे जो सीमांत क्षेत्रों का व्यवस्थापक भी था। मेगस्थनीज के अनुसार चंद्रगुप्त की सेना में 6 लाख पैदल, 50000 अश्वरोही, 9 हजार  हाथी और 800 रथ सैनिक थे।

मौर्य काल की गुप्तचर व्यवस्था अपने आप में अद्वितीय थी।  कौटिल्य ने अपनी पुस्तक अर्थशास्त्र में गुप्तचर को गूढ़पुरुष कहा है। नर गुप्तचरो को संती, तिष्णा तथा शरद कहा जाता था। जबकि स्त्री गुप्तचरों को वृषली, भिक्षुकी तथा परिव्राजक कहा जाता था। एरियन ने गुप्तचरों को ओवरसीयर तथा स्ट्रेबो ने इंस्पेक्टर कहा कहा है।
 गुप्तचर दो प्रकार के होते थे:-
१.संस्था- यह गुप्तचर एक ही स्थान पर संगठित होकर कार्य करते थे।
२.संचार- ये गुप्तचर भ्रमणशील होते थे।

मौर्य साम्राज्य का पतन

मौर्य वंश अपने समय में सबसे शक्तिशाली राजवंश था। लेकिन 232 ईसा पूर्व में अशोक के राज्य काल के समाप्त होते ही इसका विघटन शुरू हो गया। मौर्य वंश के अंतिम शासक वृहद्रथ की हत्या 184 ईसा पूर्व में उसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने  कर दी तथा सिंहासन पर अधिकार कर लिया।




                                     Penned by ✍ शोभित अवस्थी

सम्राट अशोक

अशोक महान 

सम्राट अशोक
सम्राट अशोक

अशोक मौर्य वंश का सबसे महानतम शासक था। वह चंद्रगुप्त मौर्य का पौत्र तथा बिंदुसार का पुत्र था। अशोक का जन्म 13 अप्रैल 304 ईसा पूर्व को पाटलिपुत्र में हुआ था। सिंघली  अनुश्रुतियों के अनुसार अशोक ने अपने 99 भाइयों की हत्या करके मगध की सत्ता पाई थी। लेकिन यह  बात किवदंतियों पर आधारित है इसलिए इसकी सच्चाई प्रमाणित नहीं है। राज्याभिषेक से पहले अशोक उज्जैन का राज्यपाल था।

अशोक के 13 वे अभिलेख  से हमें कलिंग युद्ध के विषय में जानकारी प्राप्त होती है । अशोक की गृह व विदेश नीति बौद्धधर्म के आदर्शो से प्रेरित थी । सिंहासन प्राप्त करने के उपरांत अशोक ने मात्र एक युद्ध किया जो कलिंग युद्ध के नाम से जाना जाता है। इस युद्ध में लगभग एक लाख लोग मारे गए , इससे कहीं ज़्यादा घायल हुए तथा डेढ़ लाख लोग बंदी बनाए गए । आंकड़े अतिशंयोक्तिपूर्ण लग रहे हैं फिर भी इस भारी नरसंहार को देखकर अशोक द्रवित हो उठे। कलिंग युद्ध ने सम्राट अशोक के हृदय में महान परिवर्तन किया। अशोक ने युद्ध क्रियाओं को हमेशा के लिए बंद करने की शपथ ली।

अशोक ने उपगुप्त नामक बौद्ध भिक्षु से दीक्षा लेकर बौद्ध धर्म अपना लिया। जबकि इसके पूर्व अशोक ब्राह्मण मत का अनुयायी था। अशोक ने अपने शासनकाल में 10 वें वर्ष बोधगया की यात्रा की तथा 20 वें वर्ष लुम्बनी की यात्रा की तथा उसे कर मुक्त  घोषित कर दिया।

अशोक के शासनकाल से पूर्व विहार यात्राओं का प्रचलन था जिसमे मनोरंजनार्थ पशुओं का शिकार किया जाता था । अशोक ने इनके स्थान पर धम्म यात्रा का प्रावधान किया है जिसमें ब्राह्मणों, भिक्षुओ, श्रमणों तथा वृद्धो को दान दिया जाता था। अशोक ने शासन के 14वें वर्ष धम्ममहामात्र को नियुक्त किया । धम्ममहामात्र का प्रमुख कार्य धम्म का प्रचार करना तथा  कल्याणकारी कार्य करना होता था। अशोक ईरान के शासक दारा(डैरीयस ) से प्रेरणा लेकर जनता को अभिलेखों के द्वारा संबोधित करने वाला प्रथम शासक बना।

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तृतीय बौद्ध संगीति का आयोजन 250 ईसा पूर्व पाटलिपुत्र में अशोक के काल में हुआ जिसकी अध्यक्षता मोग्गालिपुत्ततिस्स  ने की थी। इस संगीति में तीसरे पिटक अभिधम्मपिटक की रचना हुई तथा बौद्ध भिक्षुओं को विभिन्न देशों में भेजा गया जिनमें महेंद्र तथा संघमित्रा ( माता- शाक्य कुमारी 'देवी') भी शामिल थे जिन्हें श्रीलंका भेजा गया था।
अशोक पुत्र महेन्द्र
महेन्द्र



अशोक पुत्री संघमित्रा
संघमित्रा

अशोक ने राजनीतिक एकता स्थापित की। वह बौद्ध धर्म का अनुयायी था किंतु उसने अन्य सभी धर्मों का सम्मान किया। उसने प्रजा पर बौद्ध धर्म को लादने का प्रयास नहीं किया। उसने हर संप्रदाय को दान दिए। चाहे बौद्ध धर्म का अनुयायी हो या विरोधी। अशोक अहिंसा, शांति तथा  लोककल्याणकारी नीतियों के लिए विश्व विख्यात था। उसनेपशु हत्या तथा शिकार करना छोड़ दिया था । जनकल्याण के लिए सड़क, पाठशाला तथा चिकित्सालय बनवाये। वह अतुलनीय सम्राट था। अशोक ने लगभग 36 वर्षों तक शासन किया जिसके बाद लगभग 232 ईसा पूर्व उसकी मृत्यु हो गई।

अभिलेख

अशोक भारत का पहला राजा था जिसने अपने अभिलेखों के द्वारा अपनी प्रजा को संबोधित किया। अशोक के अभिलेखों को सर्वप्रथम जेम्स प्रिंसेप ने 1937 में पढ़ने में सफलता हासिल की। कर्नाटक में पाए गए 3 लघु शिलालेखों तथा मध्य प्रदेश के दतिया जिले में प्राप्त लघु शिलालेख में अशोक का नाम अशोक लिखा मिला है। इसके अतिरिक्त अन्य सभी अभिलेखों में अशोक को देवानाप्रिय, प्रियदर्सी् (देवोंं का प्यारा) के नाम से वर्णित किया गया है । अशोक के अधिकतर अभिलेख ब्राम्ही लिपि में पाए गए हैं किंतु पश्चिमोत्तर भारत में कुछ  अभिलेख खरोष्ठी तथा अरमाइक  लिपि में भी पाए गए है।

अशोक के अभिलेखों को 5 श्रेणियों में बांटा गया है-
            1.शिलालेख
            2.लघु शिलालेख
            3.स्तंभलेख
            4.लघुस्तंभलेख
            5.गुहालेख

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अशोक के शिलालेख

 अशोक के 14 शिलालेख आठ अलग-अलग स्थानों से प्राप्त है।

 1.शाहबाजगढ़ी:

 इस शिलालेख की खोज 1836 ईसवी में पेशावर (पाकिस्तान) में हुई थी। यह खरोष्ठी लिपि में है।

 2.मानसेहरा:

यह  शिलालेख पाकिस्तान के हजारा जिले में स्थित है जिसकी खोज 1889 ईसवी में हुई थी।यह अभिलेख भी खरोष्ठी लिपि में लिखा गया है।

3.गिरनार:

गिरनार शिलालेख ब्राह्मी लिपि में लिपिबद्ध है जिसकी  खोज 1822 में जूनागढ़ (गुजरात) में की गई थी।

4. धौली:

यह शिलालेख 1837ईस्वी में पुरी (उड़ीसा) में खोजा गया। यह ब्राम्ही लिपि में है।

5.कालसी :

कालसी शिलालेख की खोज 1837 ईस्वी में हुई थी । यह ब्राह्मी लिपि में है तथा देहरादून (उत्तराखंड) में स्थित है।

6.जौगढ़:

जौगढ़ शिलालेख की खोज आंध्र प्रदेश के गंजाम जिले में 1850 ईसवी में हुई थी।  यह ब्राम्ही में लिपिबद्ध है ।

7.सोपारा: 

यह शिलालेख महाराष्ट्र के पालघर जिले में स्थित है जिसकी खोज 1882 ईसवी में हुई थी। यह ब्राम्ही लिपि में लिखा गया है ।


8. ऐरागुडि:

यह शिलालेख ब्राह्मी लिपि में लिखा गया है। इसकी खोज 1916 में कुरनूल(आंध्र प्रदेश) में की गई है।


सांची स्तूप, दक्षिणी दरवाजा ( सम्राट अशोक के तत्कालीन रामग्राम स्तूप,सांची के भम्रण को दर्शाया गया है)

लघु शिलालेख

इनकी संख्या 15 बताई गई है।

1. रूपनाथ- जबलपुर (मध्य प्रदेश)
2. गुजर्रा- दतिया (मध्य प्रदेश)
3 नेत्तूर -मैसूर (कर्नाटक )
4.भाब्रू -जयपुर (राजस्थान)
5. मास्की -रायचूर (आंध्र प्रदेश)
6. अहरौरा -मिर्जापुर (उत्तर प्रदेश)
7. राजुल मंडगिरी- कुर्नूल (आंध्र प्रदेश)
8.एरागुडि- कुर्नूल (आंध्र प्रदेश)
9. गोविमठ- हॉस्पेट (कर्नाटक)
10.पालकिगुंड- हॉस्पेट (कर्नाटक)
11. ब्रह्मागिरी- चित्तलदुर्ग (कर्नाटक)
12.जटिन रामेश्वर (कर्नाटक)
13. सिद्धपुर (कर्नाटक)
14. सहसराम -शाहाबाद (बिहार )
15. सारो-मारो -शहडोल (मध्य प्रदेश)

【छोटा नागपुर का पठार ; खनिज संसाधन का केन्द्र तथा जहाँ से निकलती हैं... दामोदर और स्वर्णरेखा जैसी नदियाँँ】

स्तंभ लेख

1.दिल्ली टोपरा स्तंभ लेख :

प्रारंभ में यह हरियाणा के अंबाला जिले के टोपरा नामक स्थान पर स्थित था किंतु तुगलक वंश के शासक फिरोजशाह ने इसे दिल्ली के कोटला नामक स्थान पर स्थापित करवाया। इस पर अशोक के सातो अभिलेख उत्कीर्ण है जबकि बाकी सब पर सिर्फ छह लेख ही मिले है।


2. दिल्ली-मेरठ स्तंभ लेख :

प्रारंभ में उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में स्थित था। इसे भी फिरोजशाह तुगलक द्वारा दिल्ली के कोटला मैदान में स्थापित करवाया गया।

3. लौरिया अरराज स्तम्भ लेख:

अरराज स्तंभ लेख  बिहार के चंपारण में स्थित है।

4. लौरिया नंदनगढ़ स्तंभलेख:

यह स्तंभलेख भी बिहार के चंपारण में पाया गया है। स्तंभ लेख पर मोर का चित्र बना है

5. रामपुरवा स्तंभ लेख :

अशोक का रामपुरवा स्तम्भ ( लेख विहीन)
रामपुरवा स्तम्भ ( लेख विहीन)

यह बिहार के चंपारण क्षेत्र में स्थित है ।इस स्तम्भ (लेख सहित) पर एक सिंह की आकृति उत्कीर्ण है जबकि लेख विहीन स्तम्भ में बैल की आकृति उत्कीर्ण है।

6.प्रयाग स्तंभ लेख:

अशोक का प्रयाग स्तम्भ लेख
प्रयाग स्तम्भ लेख

यह स्तंभ लेख मूलतः कौशांबी में स्थित था किंतु मुगल शासक अकबर ने इसे इलाहाबाद के किले में रखवा दिया था। इस स्तंभ लेख पर रानी कारूवाकी (चारुवाकी) द्वारा बौद्ध संघ को दिए गए दान का उल्लेख है। रानी कारुवाकी अशोक की पत्नी थी।
बाद में इसी अभिलेख पर कवि हरिषेण द्वारा समुद्रगुप्त की प्रशंसा में रचित प्रयाग प्रशस्ति उत्कीर्ण कराया गया। कालांतर में मुगल शासक जहांगीर ने भी अपना लेख इसी स्तम्भ लेख पर लिखवाया।
अशोक पत्नी.. रानी कारूवाकी
रानी कारूवाकी
【जेनेटिक इंजीनियरिंग : जीन चिकित्सा में अमूल्य योगदान】

 लघु स्तंभ लेख


1. सांची -मध्य प्रदेश
2. सारनाथ -उत्तर प्रदेश
 
अशोक का सारनाथ स्तम्भ लेख
सारनाथ स्तम्भ

3.कौशांबी -उत्तर प्रदेश
4.रुम्मानिदेई-नेपाल
 5.निग्लीवा- नेपाल

 गुहा लेख 


बिहार में गया के समीप बाराबार की पहाड़ियों में अशोक के तीन गुफा लेख मिले हैं। यह सभी ब्राम्ही तथा प्राकृत लिपि में है।

......

【मौर्य वंश के प्रथम शासक... चन्द्र गुप्त मौर्य】

                   ✍✍ Penned By- Shobhit Awasthi

चंद्रगुप्त मौर्य

चंद्रगुप्त मौर्य

चन्द्रगुप्त मौर्य
चन्द्रगुप्त मौर्य

मौर्य राजवंश प्राचीन भारत के सबसे शक्तिशाली राजवंशों में से एक था ; जिसकी स्थापना चंद्रगुप्त मौर्य ने नंदवंशीय शासक घनानंद को पराजित करके की थी। चंद्रगुप्त की विजय में तथा मौर्य वंश की स्थापना में चाणक्य का अहम योगदान था। चाणक्य (कौटिल्य / विष्णुगुप्त) न सिर्फ चंद्रगुप्त के प्रधानमंत्री थे बल्कि वह चंद्रगुप्त के गुरु भी थे। चंद्रगुप्त मौर्य ने 24 वर्षों (322-298  ईसा पूर्व) तक शासन किया।

विष्णु पुराण, महाभारत तथा मुद्राराक्षस के अनुसार चंद्रगुप्त के पिता का नाम सूर्य गुप्त (सर्वार्थसिद्धि) तथा माता का नाम मुरा (शिव) था।

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चंद्र गुप्त मौर्य ने तत्कालीन यूनानी शासक सेल्यूकस निकेटर को पराजित किया था। संधि हो जाने पर सेल्यूकस ने चंद्रगुप्त से 500 हाथी लेकर बदले में सिंधु नदी के पश्चिम का क्षेत्र, पूर्वी अफगानिस्तान तथा बलूचिस्तान चंद्रगुप्त को दे दिया तथा अपनी पुत्री हेलेना(कार्नेलिया) का  विवाह भी चंद्रगुप्त से कर दिया। सेल्यूकस ने मेगास्थनीज नामक एक दूत भी चंद्रगुप्त के दरबार में भेजा।

मेगास्थनीज ने 4 वर्ष तक चंद्रगुप्त के दरबार में दूत के रूप में अपनी सेवाएं दी। उसने एक पुस्तक इंडिका लिखी जिसमें चंद्रगुप्त के शासनकाल का विस्तृत विवरण उपलब्ध है। फिलार्कस व स्ट्रेबो और जस्टिन ने चंद्रगुप्त को संड्रोकोट्स तथा एरियन तथा प्लूटार्क ने एंड्रोकोटस कहा।


चंद्रगुप्त मौर्य के साम्राज्य की शासन व्यवस्था का ज्ञान मुख्य रूप से मेगस्थनीज की इंडिका तथा चाणक्य के अर्थशास्त्र से प्राप्त होता है। राजा शासन के विभिन्न अंगों का प्रधान था। मेगास्थनीज के अनुसार राजा दिन में सोता नहीं था। वह दिनभर न्याय और शासन के अन्य कार्यों के लिए दरबार में रहता था।  राजा के प्राणों की रक्षा के लिए उचित उपाय किए गए थे। राजा के शरीर की रक्षा अस्त्रधारिणी स्त्रियां करती थी। मेगास्थनीज के अनुसार राजा हर रात अपने शयनकक्ष बदलता रहता था क्योकि उसे प्राणों का भय लगा रहता था। राजा केवल युद्ध, यज्ञ तथा अनुष्ठान, न्याय और शिकार के लिए ही अपने प्रासाद से बाहर आता था। शिकार के समय राजा का मार्ग रस्सियों से घिरा होता था जिसको लांघने पर मृत्युदंड मिलता था।

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चाणक्य द्वारा लिखित 'अर्थशास्त्र' के अनुसार राजा का आदर्श उच्च होता था; प्रजा के सुख में ही राजा का सुख तथा प्रजा के दुख में ही राजा का दुख निहित होता है। मेगस्थनीज की इंडिका के अनुसार राजा की सहायता के लिए एक परिषद गठित थी। बड़े-बड़े विद्वान इस परिषद के सदस्य थे। इस परिषद के द्वारा ही राज्यों के मुख्य पदाधिकारियों का चुनाव किया जाता था; यह बात अप्रमाणित है कि राजा परिषद की सलाह मानने को बाध्य था।

चन्द्रगुप्त मौर्य साम्राज्य
चन्द्रगुप्त मौर्य साम्राज्य

चंद्रगुप्त मौर्य के विशाल साम्राज्य में काबुल,हेरात, कंधहार, बलूचिस्तान, पंजाब, गंगा यमुना का दोआब, बिहार, बंगाल तथा गुजरात विन्ध्य व कश्मीर का भूभाग भी सम्मिलित था।चंद्रगुप्त मौर्य ने अपना साम्राज्य पश्चिमोत्तर में ईरान से लेकर पूर्व में बंगाल तक तथा उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में उत्तरी कर्नाटक पर फैलाया था। गिरनार अभिलेख(150 ईसा पूर्व) के अनुसार सौराष्ट्र में पुण्यगुप्त वैश्य चंद्रगुप्त का राज्यपाल था जिसने सुदर्शन झील का निर्माण कराया था।

श्रवणबेलगोला (कर्नाटक) में मिले शिलालेखों के अनुसार चंद्रगुप्त ने अपने जीवन के अंतिम समय में जैन संत भद्रबाहु से प्रभावित होकर जैन धर्म अपना लिया था तथा जैन मुनि बन गए थे । वह जैन साधु के साथ श्रवणबेलगोला चले आये थे।  वे जिस पहाड़ी पर रहते थे उसका नाम चंद्रगिरी था तथा वहीं पर उन्होंने चंद्रगुप्तबस्ति नामक मंदिर भी बनवाया। चंद्रगुप्त ने श्रवणबेलगोला में 298 ईसापूर्व में जैन परंपरा की सल्लेखना (उपवास) विधि द्वारा अपना शरीर  त्याग दिया।

【चोल वंश में राजा के व्यक्तिगत अंगरक्षक को बेडैैक्काल कहते थे.. और मंत्रियों को....? 】 👈 क्लिक करें

                      ✍Penned By- Shobhit Awasthi

चोल साम्राज्य

चोल साम्राज्य एवं प्रशासन

चोल साम्राज्य का राजनीतिक उत्कर्ष 10 वीं शताब्दी के मध्य में प्रारंभ हुआ किंतु इसका प्रारंभिक इतिहास तीसरी शताब्दी में संगम युग से प्रारंभ होता है। चोल साम्राज्य की स्थापना 9वीं शताब्दी में विजयालय ने की थी जो पल्लवों का सामंत था। चोल साम्राज्य पेन्नार तथा कावेरी नदियों के बीच पूर्वी समुद्र तट पर स्थित था। विजयालय के पश्चात उसका पुत्र आदित्य प्रथम (887 - 907)  शासक बना। सिंहासनरोहण के समय भी आदित्य पल्लवों का सामंत था। आदित्य ने ही सर्वप्रथम चोलो को पूर्णता स्वतंत्र शक्ति के रूप में घोषित किया। इसने पल्लव को पराजित करने के उपलक्ष में "कोदंडराम " की उपाधि धारण की। 'राजराज चोल' तथा उसका पुत्र 'राजेंद्र प्रथम' चोल वंश के महानतम शासक रहे तत्कालीन समय में चोल साम्राज्य की नौसेना सबसे श्रेष्ठ थी। राजेंद्र प्रथम ने अरब सागर में स्थित 'सदिमंतीव द्वीप' पर अधिकार कर अपनी नौसेना की श्रेष्ठता साबित की।


चोल साम्राज्य


◆चोल प्रशासन


चोल प्रशासन के अंतर्गत केंद्रीय प्रशासन में राजा सर्वोच्च पद पर होता था। शासन राजतंत्रात्मक स्वरुप में था। उत्तराधिकार के लिए  ज्येष्ठता को वरीयता दी जाती थी तथा उपराजा के पद पर सदैव राजकुमारी आसीन होती थी। सरकारी पद वंशानुगत होते थे। नायक, सेनापति, महादंडनायक सेना के विशेष अधिकारी थे जिन्हें वेतन के रूप में जमीनें दी जाती थी। राजा के व्यक्तिगत अंगरक्षकों को "बेडैक्कार" कहा जाता था तथा मंत्रियों को "उडंकुट्टम" कहते थे।

◆संरचना

प्रशासन की सुविधा अनुसार चोल साम्राज्य 6 मंडलम(प्रान्तों) में विभक्त था। प्रत्येक मंडलम में राजपरिवार का व्यक्ति प्रशासन का कार्यभार संभालता था। मंडलम वलनाडु(जिला) में विभक्त थे, वलनाडु नाडु (गांव)में विभक्त थे तथा नाडु कुर्रम(कोट्टम) में विभक्त थे। दूसरे शब्दों में बात करें तो साम्राज्य की प्रशासनिक इकाइयां (अवरोही क्रम) इस प्रकार विभक्त थी-
राज्य-मंडलम-वलनाडु-नाडु-कुर्रम ।


◆आय का साधन

राज्य की आय का प्रमुख साधन भूमि कर था। इसे ग्रामसभा द्वारा एकत्र किया जाता था। कृषि उपज का एक तिहाई भू-राजस्व निर्धारित किया जाता था। इसके अलावा सीमा शुल्क, राहदारी, उद्योग पर लगाए गए कर भी राज्य की आय के स्रोत थे। विवाह समारोह पर भी कर लगाया जाता था। चोल काल में सोने के सिक्कों को "काशु" कहा जाता था। भूमि  को मापने की इकाई "वेलि" कहलाती थी तथा राजस्व विभाग के प्रमुख अधिकारी को "वारितपोत्तराक्क" कहा जाता था।


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◆सैन्य व्यवस्था

चोल सेना के तीन प्रमुख अंग थे-
        1. पदति
        2.गजरोही
        3.अश्वारोही
सेना में सभी वर्णों के लोग सम्मिलित थे। सेनाध्यक्ष को 'महादंडनायक' कहा जाता था। थल सेना में धनुर्धर, गजरोही और घुड़सवार तथा पैदल सेना शामिल थी चोलो की नौसेना अपने आप में विशेष थी।

◆स्थानीय स्वशासन 

उत्तमेरुर अभिलेखों से चोल कालीन स्थानीय स्वशासन एवं ग्राम व्यवस्था का विस्तृत विवरण मिलता है। स्थानीय प्रशासन व्यवस्था समिति "वरियम" कहलाती थी। चोल काल में तीन प्रकार की ग्राम सभा थी।
     1.उर-साधारण लोगो की ग्राम सभा।
     2. महासभा- वरिष्ट ब्राह्मणों की सभा जिसे "अग्रहार" भी कहते थे।
    3.नगरम - व्यापारिक समुदाय की सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रशासनिक  सभा। 

वरियम (कार्यकारिणी समिति) की सदस्यता के लिए कुछ योग्यताएं निर्धारित थी-

      1. आयु 35 से  70 के मध्य 
      2.कम से कम डेढ़ एकड़ भूमि का होना 
      3.स्वयं के मकान में रहता हो
      4. वैदिक मंत्रों का ज्ञाता हो


◆समाज

चोल काल में  समाज दो वर्गों में विभक्त था जिनमें ब्राह्मण तथा अब्राह्मण थे। अब्राह्मणों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण शूद्र थे। इस काल में दो औद्योगिक समूह भी थे दक्षिण वर्गीय(वलंगई) तथा वाम वर्गीय(इडंगई)। चोल साम्राज्य में क्षत्रिय व वैश्य वर्ग न थे। अछूत वर्गों को 'परैया' तथा शूद्र कृषको को 'वेल्लार'कहते थे। स्त्रियों की स्थिति उत्तर भारत से बेहतर थी किंतु देवदासी प्रथा तथा दासप्रथा प्रचलित थी।



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◆वास्तुकला

चोल कला द्रविड़ शैली के मंदिरों के निर्माण में शीर्ष पर पहुंच गई। राजराज चोल द्वारा निर्मित 'बृहदेश्वर मंदिर (तंजौर)' द्रविड़ शिल्प कला की सर्वोत्तम कृति माना जाता है। चोल काल में धातु मूर्तियों का निर्माण भी अधिकाधिक हुआ जिनमें अधिकांश कांस्य  मूर्तियां थी। सर्वाधिक सुंदर कांस्य मूर्ति  नटराज(शिव)की मूर्ति है।

         
                          ✍✍Penned By - Shobhit Awasthi

महाजनपद काल


महाजनपद काल

महाजनपद काल
महाजनपद
प्राचीन भारत में राज्य प्रशासन करने वाली इकाइयों को महाजनपद कहते थे। सोहल महाजनपदों के अस्तित्व का उल्लेख बौद्ध ग्रंथ 'अंगुत्तरनिकाय' से प्राप्त होता है। इन महाजनपदों में सबसे शक्तिशाली मगध था। इन सोहल महाजनपदों में अस्मक एकमात्र ऐसा महाजनपद था जो दक्षिण भारत में गोदावरी नदी के किनारे स्थित था। जैन ग्रंथ "भगवती सूत्र" भी हमें सोहल महाजनपदों की जानकारी देता है महाजनपद काल में गणतंत्र तथा राजतन्त्र दोनों तरह की व्यवस्था थी। गौतम बुद्ध के समय दस गणतंत्र स्थापित थे।

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 सोलह महाजनपद


 1.अवंति:


आधुनिक मालवा को प्राचीन काल में अवंति के नाम से जाना जाता था। अवंति दो भागों में बटी हुई थी उत्तरी अवंति जिसकी राजधानी उज्जयिनी तथा दक्षिणी अवंति जिसकी राजधानी माहिष्मती थी ।

2.अंग:


 आधुनिक बिहार के भागलपुर और मुंगेर जिले मिलकर अंग साम्राज्य का निर्माण करते थे। यह मगध के पूर्व में स्थित था तथा अंग तथा मगध हमेशा आपस में संघर्षरत रहते थे। अंत में इसका विलय मगध में हो गया । इसकी राजधानी चंपा थी जो भारत के प्रसिद्ध नगरो में से एक थी।

3.अस्मक:


 दक्षिण भारत में स्थित एकमात्र महाजनपद । ये गोदावरी नदी के तट पर स्थित था इसकी राजधानी पोतन (पैठन)थी  यहां इक्ष्वाकु वंश के राजाओं का शासन था जो निरंतर अवंति के साथ संघर्षरत थे। अंत में यह अवंति के अधीन हो गया।

4.कंबोज:

यह भारत से बाहर स्थापित था। गांधार तथा कश्मीर का उत्तरी भाग इसमें सम्मिलित था जिसकी राजधानी लाजपुर थी ।


5.काशी:


आधुनिक उत्तर प्रदेश का दक्षिणी पूर्वी भाग काशी महाजनपद के रूप में जाना जाता था। यहाँ की राजधानी वाराणसी थी जो वरुणा तथा असी नदियों के संगम पर स्थित थी। जैन धर्म के 23वें तीर्थंकर पार्श्वनाथ के पिता अश्वसेन  काशी के राजा थे ।

6.कौशल:


कौशल महाजनपद  में आधुनिक उत्तर प्रदेश के गोंडा, अयोध्या, श्रावस्ती तथा बहराइच क्षेत्र शामिल थे। इसकी प्रथम राजधानी अयोध्या थी तथा दूसरी राजधानी श्रावस्ती थी। कौशल के एक राजा कंस को पालि ग्रंथों में "बरानसिग्गहो" कहा गया है। इसने काशी को जीतकर कौशल में विलय कर लिया था। प्रसेनजीत कौशल के एक महान शासक थे।

7.कुरू:


इंद्रप्रस्थ तथा हस्तिनापुर(आधुनिक दिल्ली) के आसपास का क्षेत्र कुरु महाजनपद के अंतर्गत आता था। जैनों के "उत्तराध्ययन सूत्र" में यहां के इक्ष्वाकु नामक राजा का उल्लेख मिलता है। महाभारत महाकाव्य में भी इसका वर्णन किया गया है। इसकी राजधानी इंद्रप्रस्थ थी ।

8.गांधार:


आधुनिक अफगानिस्तान का पूर्वी तथा पाकिस्तान का पश्चिमी क्षेत्र और कश्मीर का कुछ भाग इसमें सम्मिलित था। इसकी राजधानी तक्षशिला थी जो एक प्रसिद्ध शिक्षा का केंद्र था।

 9.चेदि:


 बुंदेलखंड और उसके आसपास के भाग मिलकर चेदि महाजनपद का निर्माण करते थे। इसकी राजधानी सुक्तिमती थी। इसका वर्णन महाभारत में भी है। शिशुपाल  यहां का राजा था।

 10.वज्जि:


इसे विश्व के प्राचीनतम गणराज्य के जन्मदाता के रूप में जाना जाता है। यह आठ गणतांत्रिक कुलो का संघ था जो उत्तरी बिहार में गंगा के उत्तर में स्थित था।इसकी  राजधानी वैशाली थी ।

11.वत्स:

प्रयागराज के आसपास का भाग वत्स महाजनपद का भाग था। इसकी राजधानी कौशांबी थी।

 12.पांचाल:


 पांचाल महाजनपद रुहेलखंड और मध्य दोआब (पश्चिमी उत्तर प्रदेश) के अंतर्गत बसा हुआ था यह दो भागों में बटा था उत्तरी पांचाल जिसकी राजधानी अहिच्छत्र थी तथा दक्षिणी पांचाल जिसकी राजधानी काम्पिल्य थी।

 13.शूरसेन:


 कुरु जनपद के दक्षिण में और चेदि जनपद के पश्चिमोत्तर में शूरसेन महाजनपद स्थित था। यहां की राजधानी मथुरा थी। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार अवंति पुत्र यहां का राजा था। पुराणों में मथुरा के राजवंश को यदुवंश कहा गया है।

 14.मत्स्य: 


आधुनिक राजस्थान के भरतपुर, अलवर तथा जयपुर जिले इस महाजनपद का निर्माण करते थे। यहां की राजधानी विराटनगर थी।

 15.मल्ल:


 यह महाजनपद गोरखपुर तथा देवरिया के आसपास के क्षेत्र में बसा हुआ था यह भी एक गणतंत्र था। इसकी भी दो शाखाएं थी एक की राजधानी कुसीनारा (कुशीनगर )तथा दूसरे की राजधानी पावा थी।

 16.मगध:


मगध पटना तथा गया जिलों में फैला हुआ था। इसकी प्रारंभिक राजधानी राजगीर थी जो चारों ओर से पर्वतों से घिरी होने के कारण गिरिव्रज कहलाई। मगध सभी महाजनपदों में सबसे शक्तिशाली महाजनपद था।

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 गौतम बुद्ध कालीन गणतंत्र 


लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व बुद्ध के समय दस गणतंत्र राज्य थे जिनमें आठ वज्जि के तथा दो मल्ल के अंतर्गत थे-

1. कपिलवस्तु के शाक्य

2.अल्लकम्प के बुली

3.रामग्राम के कोलिय

4.पिप्पलिवन के मोरिथ

5.वैशाली के लिच्छिवि

6.सुमसुमारगिरि के मग्ग

7.केसपुत्त के कालाम

8.मिथिला के विदेह

9.पावा के मल्ल

10.कुसिनारा के मल्ल




                         ✍✍ Penned By - Shobhit Awasthi

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